ग्रहों की अवस्था (grahon ki avastha) : दीप्त, स्वस्थ, प्रमुदित, शांत, दीन, दुःखित, विकल, खल और कुपित

ग्रहों की अवस्था (grahon ki avastha) : दीप्त, स्वस्थ, प्रमुदित, शांत, दीन, दुःखित, विकल, खल और कुपित ग्रहों की अवस्था (grahon ki avastha) : दीप्त, स्वस्थ, प्रमुदित, शांत, दीन, दुःखित, विकल, खल और कुपित

ज्योतिष में जब जन्मकुंडली का अध्ययन किया जाता है तो वहां ग्रहों की अवस्था (grahon ki avastha) का भी अपना महत्व होता है और फलादेश में ग्रहों की अवस्था का ध्यान रखना आवश्यक होता है। ग्रहों की अवस्था को दो प्रकार की होती है एक वयावस्था (बालादि) और दूसरी भावनात्मक या मानसिक (दीप्तादि), यहां हम ग्रहों के इसी दीप्तादि अवस्था को समझने का प्रयास करेंगे और ज्योतिष ग्रंथों में इसके क्या वर्णन हैं उनको भी समझने का प्रयास करेंगे।

अधिकांश ज्योतिष ग्रंथों में हमें ग्रहों के दीप्तादि अवस्था का वर्णन देखने को मिलता है और इससे यह स्पष्ट होता है कि फलादेश में ग्रहों के दीप्तादि अवस्था का विचार करना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। बृहत्पराशर होराशास्त्र में यदि देखें तो अध्याय ४५ में हमें इस प्रकार से मिलता है :

दीप्तः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तो दीनोऽथ दुःखितः ।
विकलश्च खलः कोऽपीत्यवस्था नवधाऽपराः
॥७॥

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के अनुसार ग्रहों की नौ अवस्थाएं : दीप्त, स्वस्थ, प्रमुदित, शांत, दीन, दुःखित, विकल, खल और कोपी (कुपित) पुनः आगे और विस्तार से वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है :

स्वोच्चस्थः खेचरो दीप्तः स्वर्क्षे स्वस्थोऽधिमित्रभे।
मुदितो मित्रभे शान्तः समभे दीन उच्यते ॥८॥
शत्रुभे दुःखितः प्रोक्तो विकलः पापसंयुतः।
खलः खलगृहे ज्ञेयः कोपी स्यादर्कसंयुतः ॥९॥
यादृशो जन्मकाले यः खेटो यद्भावगो भवेत्।
तादृशं तस्य भावस्य फलमुह्यं द्विजोत्तम ॥१०॥

सारावली के पंचम अध्याय (मिश्रकाध्याय) में भी किञ्चित अंतर रखते हुये इस प्रकार से ग्रहों की नौ अवस्थाएं बताई गयी है – दीप्त, स्वस्थ, मुदित, शान्त, शक्त, निपीडित, भीत, विकल और खल

दीप्तः स्वस्थो मुदितः शान्तः शक्तो निपीडितो भीतः।
विकलः खलश्च कथितो नवप्रकारो ग्रहो हरिणा ॥२॥

स्वोच्चे भवति च दीप्तः स्वस्थः स्वगृहे सुहृद्गृहे मुदितः।
शान्तः शुभवर्गस्थः शक्तः स्फुटकिरणजालश्च॥३॥
विकलो रविलुप्तकरो ग्रहाभिभूतो निपीडितश्चैवम्।
पापगणस्थश्च खलो नीचे भीतः समाख्यातः॥४॥

जातकतत्वम् के भी प्रथम अध्याय में इस प्रकार से आठ अवस्थाओं का वर्णन है – “स्वोच्चगो दीप्तः स्वभगः स्वस्थो हितभगो हास्ययुक्तः शत्रुवर्गगः शान्तः स्फुरद्रश्मिः शक्तो मूढो लुप्तो नीचगो दीनः पाप शत्रुभगः पीडितः ॥७१॥ – दीप्त, स्वस्थ, मुदित, शान्त, शक्त, लुप्त, दीन और पीडित।

अब यदि फलदीपिका की बात करें तो वर्गभेदाध्याय ३ में ग्यारह अवस्थाओं का वर्णन देखने को मिलता है जो इस प्रकार है :

स्वोच्चे प्रदीप्तः सुखितस्त्रिकोणे स्वस्थः स्वगेहे मुदितः सुहृद्भे |
शान्तस्तु सौम्यग्रहवर्गयुक्तः शक्तो मतोऽसौ स्फुटरश्मिजालः ॥१८॥
ग्रहाभिभूतः स निपीडितः स्यात् खलस्तु पापग्रहवर्गयातः |
सुदुःखितः शत्रुगृहे ग्रहेन्द्रो नीचेऽतिभीतो विकलोऽस्तयातः ॥१९॥

भ्रम की स्थिति

इसी प्रकार किञ्चित अंतरों के साथ हमें अन्यान्य ग्रंथों में ग्रहों की दीप्तादि अवस्थाओं का वर्णन देखने को मिलता है और हमारे लिये भ्रम की भी एक स्थिति बन जाती है और वो यह कि किसे ग्रहण करें ?

यदि हम किसी एक पुस्तक का अवलोकन करें तो भ्रम उत्पन्न नहीं होगा किन्तु भ्रम का कारण अनेकों पुस्तकों का अवलोकन करना है एवं यह भी अनुचित होगा कि एक ही पुस्तक का अवलोकन करें अर्थात अनेकानेक पुस्तकों का अध्ययन भी करना ही होगा। इस भ्रम का एक ही निवारण है कि गुरु से ज्ञान प्राप्त किया जाय और गुरु जो ज्ञान दें, जो पक्ष ग्रहण करें वही ग्राह्य होगा। किन्तु गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाय यह भी तो असंभव है क्योंकि इसके लिये तो गुरुकुल जाना होगा।

वर्त्तमान समय में जो देखा जा रहा है वो यह कि अध्ययन स्कुल/कॉलेजों में करते हैं, आजीविका से सेवकत्व का ग्रहण कर लेते हैं और ज्योतिष की कुछ पुस्तकों का जो सरल हिन्दी में होती है अध्ययन करके कुंडली बनाना सीख लिये और थोड़ा बहुत फलादेश करना सीख लिये संयोग से फलादेश सटीक हो गया तो ज्योतिषी बन बैठे। ऐसे लोग फलादेश सटीक भी हो गया हो तो भी ज्योतिषी कहलाने के अधिकारी नहीं होते और दैवज्ञ की तो बात ही क्या करें ? दैवज्ञ बनने के लिये तो वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुये तपना भी अनिवार्य होता है।

अनधिकृत ज्योतिषियों की नारकीयता

व्यावहारिक जीवन में हमें ऐसे अनेकानेक ज्योतिषी देखने को मिलते हैं जो अनेक विधाओं का प्रयोग करते हुये कदाचित सही फलादेश करते हुये भी दिख जाते हैं किन्तु यह पूर्णरूपेण स्पष्ट है की वो नारकीय प्राणी हैं, प्रारब्धवश धनप्राप्ति का संयोग होने से उनके फलादेश सटीक बैठते दिखते हैं और वो धनाढ्य भी बन जाते हैं, किन्तु उनकी नारकीयता की सिद्धि इसी तथ्य से होती है कि वो अनधिकृत रूप से ज्योतिषीय कार्य कर रहे हैं।

सामान्य जनों को जिन्हें ज्योतिषीय परामर्श की आवश्यकता होती है वो ये नहीं विचार करते कि नारकीय प्राणी का संसर्ग उनके लिये भी नरक का मार्ग खोलने वाला सिद्ध होगा, उन्हें तो सांसारिक लाभ की आवश्यकता होती है और ऐसे नारकीय ज्योतिषी अनेकानेक मोहजाल रचने की कला में निपुण होते हैं एवं कुछ सांसारिक लाभ दिलाने में भी सक्षम होते हैं। स्वाभाविक रूप से ऐसे ज्योतिषियों की नेताओं, अधिकारियों, अधिवक्ताओं, चिकित्सकों, व्यापारियों आदि से भी संपर्क होते हैं और इस संपर्क के माध्यम से सांसारिक लाभ दिलाया जा सकता है। इन लोगों के प्रचार तंत्र भी सुदृढ़ होते हैं और अनधिकृत ज्योतिषी होते हुये भी ये प्रसिद्धि को प्राप्त करते हैं क्योंकि प्रारब्ध प्रबल होता है।

सामान्य जनों को सर्वप्रथम यह विचार करना आवश्यक होता है कि ऐसे लोगों के संसर्ग से भी बचें जो स्वयं ही नारकीय हैं, अर्थात अनधिकृत ज्योतिषी हैं। फलादेश कर देने और फलादेश का कदाचित सटीक हो जाना अधिकृत ज्योतिषी का लक्षण नहीं होता है, किन्तु अनधिकृत रूप से ज्योतिषीय कार्य करना नारकीयता का लक्षण है।

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

ऐसे ज्योतिषी जो ब्राह्मण हैं और गुरुकुल न गए हों किन्तु ब्राह्मण वृत्ति से जुड़े हों और स्वाध्याय से ज्योतिष सीखना चाहते हों उनके लिये यह विचार करना आवश्यक है कि कौन सा पक्ष ग्रहण किया जाय और इसमें यदि यह कहा जाय की एक मूल आधार होना चाहिये और उसमें बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रमुख है, अतः बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् को मूल आधार बनाते हुये आगे बढ़ना चाहिये। इसमें और भी मूल ग्रन्थ हो सकते हैं यथा भृगुसंहिता; किन्तु किसी एक का ही चयन करना चाहिये —-

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

और इतनी तपश्चर्या भी करें की किसी एक मूल ग्रन्थ जिसको ग्रहण किया गया है उसके अनुसार ही किया गया फलादेश सटीक बैठे।

अस्तु अब हम ग्रहों की अवस्था और उसके अनुसार अन्य विचार हेतु बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार आगे विचार करेंगे और गंभीरता से समझने का प्रयास करेंगे।

ग्रहों की नौ अवस्थाएं

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् में ग्रहों की नौ अवस्थाएं : दीप्त, स्वस्थ, प्रमुदित, शांत, दीन, दुःखित, विकल, खल और कोपी (कुपित) बताई गयी है और इसीको हम समझेंगे एवं इसी पक्ष को ग्रहण करते हुये आगे बढ़ेंगे।

दीप्तः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तो दीनोऽथ दुःखितः ।
विकलश्च खलः कोऽपीत्यवस्था नवधाऽपराः ॥४५-७॥

इन नौ अवस्थाओं का विस्तार करते हुये आगे कहा गया है कि : उच्च राशि में स्थित ग्रह दीप्त, स्वराशि (जो ग्रह अपनी राशि में स्थित हो) में स्थित स्वस्थ, अधिमित्रगृही (जो ग्रह अधिमित्र की राशि में स्थित हो) मुदित, मित्रगृही (जो ग्रह मित्र की राशि में स्थित हो) शान्त, समगृही (जो ग्रह सम की राशि में स्थित हो) वह दीन, रिपुगृही (जो ग्रह शत्रु की राशि में स्थित हो) दुःखित, पाप ग्रहों से संयुक्त होने पर विकल, पापग्रहों की राशि में स्थित होने से खल और सूर्य से संयुक्त होने पर (अस्त) कोपी (कुपित) होता है।

स्वोच्चस्थः खेचरो दीप्तः स्वर्क्षे स्वस्थोऽधिमित्रभे।
मुदितो मित्रभे शान्तः समभे दीन उच्यते ॥४५-८॥
शत्रुभे दुःखितः प्रोक्तो विकलः पापसंयुतः।
खलः खलगृहे ज्ञेयः कोपी स्यादर्कसंयुतः ॥४५-९॥

  1. दीप्त : उच्च राशि में स्थित
  2. स्वस्थ : स्वराशि (जो ग्रह अपनी राशि में स्थित हो) में स्थित
  3. मुदित : अधिमित्रगृही (जो ग्रह अधिमित्र की राशि में स्थित हो)
  4. शान्त : मित्रगृही (जो ग्रह मित्र की राशि में स्थित हो)
  5. दीन : समगृही (जो ग्रह सम की राशि में स्थित हो)
  6. दुःखित : रिपुगृही (जो ग्रह शत्रु की राशि में स्थित हो)
  7. विकल : पाप ग्रहों से संयुक्त होने पर
  8. खल : पापग्रहों की राशि में स्थित हो तो
  9. कोपी : सूर्य से संयुक्त होने पर (अस्त)

अब यहां हम यह भी देखते हैं कि मूलत्रिकोण, नीच, अधिशत्रु आदि के बारे में स्पष्टतः उल्लेख नहीं मिलता है तो यहां हम मूलत्रिकोणस्थ के लिये उच्च के समान दीप्त ग्रहण कर सकते हैं, नीच के लिये उच्च का विपरीत दीप्त से अदीप्त, अधिशत्रुगृही होने पर अतिदुःखित आदि ग्रहण कर सकते हैं परन्तु उसका भाव मात्र ग्रहण करेंगे न कि उसे अवस्था घोषित करेंगे। सारावली आदि में षड्वर्ग के आधार पर भी उल्लेख मिलता है किन्तु षड्वर्ग की शुभाशुभता का आधार लेकर फलों की शुभाशुभता स्वतः सिद्ध हो जाती है।

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् में ग्रहों की जो नौ अवस्थायें वर्णित की गयी हैं, उसके आधार पर फल की मात्रा का अनुमान किया जा सकता है। नौ अवस्था हैं अर्थात फलों को नौ भाग में विभाजित करके तारतम्य स्थापित करना चाहिये यथा दीप्त ग्रह का पूर्ण फल और कोपी ग्रह का नवांश मात्र। नीच हो तो पूर्ण अभाव इस प्रकार से नीच में स्थित का भी विचार किया जा सकता है।

यादृशो जन्मकाले यः खेटो यद्भावगो भवेत्।
तादृशं तस्य भावस्य फलमुह्यं द्विजोत्तम ॥४५-१०॥

यहां अवस्था में दो अवस्था भी प्राप्त हो सकती है जैसे दीप्त भी हो और कोपी भी हो, तो उस अवस्था में दोनों का तारतम्य स्थापित करते हुये औसत को ग्रहण किया जा सकता है। यहां एक अन्य तथ्य भी सम्बद्ध है और वो है पंचधा मैत्री का विचार।

पंचधा मैत्री विचार

ग्रहों की अवस्था ज्ञात करने के लिये हमें पंचधा मैत्री का विचार करना भी अनिवार्य है। यदि हम पंचधा मैत्री विचार नहीं करेंगे तो अधिमित्र व सम ग्रह का ज्ञान नहीं होगा और तदनुसार जो दो अवस्था मुदित और दीन है उसका निर्धारण नहीं किया जा सकेगा। अस्तु हमें पंचधा मैत्री चक्र का भी निर्माण करना आवश्यक हो जाता है जब हम बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के अनुसार ग्रहों की अवस्था ज्ञात करना चाहते हैं। पंचधा मैत्री विचार हम आगे करेंगे।

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