ज्योतिष में जब जन्मकुंडली का अध्ययन किया जाता है तो वहां ग्रहों की अवस्था (grahon ki avastha) का भी अपना महत्व होता है और फलादेश में ग्रहों की अवस्था का ध्यान रखना आवश्यक होता है। ग्रहों की अवस्था मुख्यतः दो प्रकार की होती है एक वयावस्था (बालादि) और दूसरी भावनात्मक या मानसिक (दीप्तादि), यहां हम ग्रहों के इसी बालादि अवस्था को समझने का प्रयास करेंगे और ज्योतिष ग्रंथों में इसके क्या वर्णन हैं उनको भी समझने का प्रयास करेंगे।
ग्रहों की अवस्थाएं (graho ki avastha) : बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत
अधिकांश ज्योतिष ग्रंथों में हमें ग्रहों के बालादि अवस्था का वर्णन देखने को मिलता है और इससे यह स्पष्ट होता है कि फलादेश में ग्रहों के दीप्तादि अवस्था का विचार करना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। बृहत्पराशर होराशास्त्र में यदि देखें तो अध्याय ४५ में हमें इस प्रकार से मिलता है :
क्रमाद्बालः कुमारोऽथ युवा वृद्धस्तथा मृतः।
षडंशैरसमे खेटः समे ज्ञेयो विपर्ययात् ॥३॥
बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के अनुसार ग्रहों की पांच अवस्थाएं : बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत। ये पांचों अवस्थायें राशियों में ग्रहों की अंशात्मक स्थिति के आधार पर निर्धारित की गयी हैं। एक राशि में ३० अंश (डिग्री) होते हैं यदि इन्हें ५ भागों में विभाजित करें तो ६-६ अंश प्राप्त होते हैं। अर्थात ग्रहों की ये पांचों अवस्थायें ६-६ अंशों की होती है। विषम राशियों में बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत इसी क्रम से ६-६ अंशों की अवस्थायें निर्धारित होती हैं किन्तु सम राशियों में विपरीत क्रम से अर्थात मृत, वृद्ध, युवा, कुमार और बाल के क्रम से होती हैं।
यदि हम सारणीबद्ध करके समझें तो अधिक स्पष्ट होगा :
| अंश | विषम राशि – अवस्था | सम राशि – अवस्था |
|---|---|---|
| 0 – 6 | बाल | मृत |
| 6 – 12 | कुमार | वृद्ध |
| 12 – 18 | युवा | युवा |
| 18 – 24 | वृद्ध | कुमार |
| 24 – 30 | मृत | बाल |
- विषम राशियां : मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, और कुम्भ।
- सम राशियां : वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन।
बालादि अवस्था के अनुसार फल
बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के ४५वें अध्याय में ही आगे श्लोक ४ में बालादि अवस्थाओं के फल भी बताये गये हैं :
फलं पादमितं बाले फलार्धं च कुमारके ।
यूनि पूर्णं फलंज्ञेयं वृद्धेकिञ्चित् मृते च खम् ॥४॥
- बाल अवस्था वाला ग्रह पाद अर्थात चतुर्थांश (२५%) फल देने वाला होता है।
- कुमार अवस्था वाला ग्रह अर्ध अर्थात ५०% फल देने वाला होता है।
- युवा अवस्था वाला ग्रह पूर्ण अर्थात १००% फल देने वाला होता है।
- वृद्ध अवस्था वाला ग्रह किञ्चित अर्थात कुछ फल देने वाला होता है।
- मृत अवस्था वाला ग्रह खम् अर्थात शून्य फल देने वाला होता है।
इस प्रकार हमें ज्ञात होता है कि फलादेश में ग्रहों की बालादि अवस्था का विचार करना अत्यावश्यक होता है। यदि हम ऐसा विचार न करें तो स्वगृही ग्रह दीप्तादि अवस्था के अनुसार स्वस्थ होता है और अच्छा फल देने वाला होता है किन्तु यदि उसकी राशिगत स्थिति २४ अंश से अधिक हो मृत अवस्था वाला होगा और ऐसी स्थिति में वह शून्य फल देने वाला होता है, ऐसे में यदि स्वस्थावस्था का पूर्ण फल फलादेश करें तो कैसे फलित होगा क्योंकि बालादि अवस्था के अनुसार तो उसका शून्य फल होगा।
जातक तत्वं के अनुसार
ओजर्क्षे क्रमाद् बालकुमार युववृद्ध मृताख्या अवस्थाः समर्क्षेव्यत्ययः॥१-६८॥
इसका तात्पर्य भी यथावत ही है।
बालादि अवस्था का निर्धारण करना कठिन नहीं है न ही इसमें अनेकानेक विचार करने की आवश्यकता होती है। इसमें मात्र पांच तथ्यों को ध्यान रखना आवश्यक है, जो इस प्रकार हैं :
- पांच अवस्था : बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत
- अवस्थाओं का निर्धारण : राशियों में ६ – ६ अंश
- विषम राशियों में : यथाक्रम निर्धारण – बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत
- सम राशियों में : विपरीत क्रम से निर्धारण : मृत, वृद्ध, युवा, कुमार और बाल
- फल : बाल का चतुर्थांश, कुमार का अर्द्ध, युवा का पूर्ण, वृद्ध का किञ्चित और मृत का शून्य
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