2026 ईसाइयों का नया साल है हिन्दुओं का नहीं। 1 जनवरी से शुरू होने वाला नया साल ग्रेगोरियन कैलेंडर (Gregorian Calendar) पर आधारित है, जिसे वैश्विक स्तर पर प्रशासनिक और व्यावसायिक कार्यों के लिए अपनाया गया है। अतः 1 जनवरी को जिसे हम लोग भी नववर्ष के रूप में मनाने लगे हैं यह एक भ्रम है और इसे समझना आवश्यक है कि किसका नववर्ष है, किसे बधाई दें, क्या बधाई दें ?
नववर्षं नवचैतन्यं ददातु – नववर्ष 2026 किसका नववर्ष है, किसे बधाई दें, क्या बधाई दें – New Year 2026
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु।
सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु ॥
भारतीय काल-गणना – एक परिचय : सनातन शास्त्रों (ज्योतिष, स्मृति, पुराण आदि) में समय को ‘काल चक्र’ के रूप में देखा जाता है। जिस प्रकार दिन और रात का चक्र चलता है, उसी प्रकार देवता से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त भी अहोरात्र का चक्र चलता रहता है जिसे ब्रह्मांड में युगों का चक्र के रूप में व्यक्त कर सकते हैं। इस गणना का आधार केवल पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना नहीं है, अपितु देवताओं के समय (दिव्य वर्ष – देवताओं के वर्ष को दिव्य वर्ष कहा जाता है) और मनुष्यों के समय (मानवीय वर्ष) के बीच का संबंध है।
भारतीय कालगणना के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन नववर्ष होता है क्योंकि इसी तिथि को सृष्टि का आरम्भ हुआ था। इसका प्राकारान्तर कृष्ण पक्ष में भी मिलता है और यह व्यावहार में देखने को भी मिलता है जिसे होली, वसंतोत्सव नाम से भी जानते हैं। होली के रूप में हम वास्तव में नववर्ष ही मनाते हैं। भारतीय संस्कृति में कुछ भी ऐसे ही नहीं किया जाता है उसको उत्सव की भांति मनाया जाता है और उत्सव का एक विशेष लक्षण है घर में विशेष पक्वान्न, पायस आदि बनाना जो होली में देखने को मिलता है।
किसका नववर्ष है
अब हमें यह समझना आवश्यक है NEW YEAR 2026 जो आरंभ होने जा रहा है यह किसका नववर्ष है ? क्या हिन्दुओं का नववर्ष है ? स्पष्ट उत्तर है कि नहीं यह हिन्दुओं का नववर्ष नहीं है; ईसाइयों का नया साल है।
इसे हम आंग्ल वर्ष भी कहा जाता है जिसका तात्पर्य अंग्रेजी नया साल या अंग्रेजों का नया साल। कितने चिंता का विषय है कि हमलोग (भारतीय) स्वतंत्र हो तो गए हैं किन्तु मात्र कहने के लिये क्योंकि मानसिक रूप से तो हम परतंत्र हैं ही। यदि न होते तो आंग्ल नववर्ष हम क्यों मनाते ! हमें मानसिक-वैचारिक धरातल पर भी स्वतंत्र होने की आवश्यकता है और इसके लिये हमें किसी और से नहीं स्वयं से ही संघर्ष करना होगा। स्वयं को ही समझाना और स्वयं ही समझना होगा कि हम क्या हैं और हमारा क्या है ?

किसे बधाई दें
यह स्पष्ट है कि आंग्ल वर्ष हिन्दुओं का वर्ष नहीं है तो निःसंदेह हिन्दू इस बधाई के पात्र ही नहीं हैं क्योंकि यह हिन्दुओं का नववर्ष है ही नहीं। यदि हिन्दू बधाई के पात्र ही नहीं हैं तो परस्पर एक-दूसरे को बधाई क्यों दें ? अर्थात न दें। फिर किसको दें एक प्रश्न यह भी तो है। यह प्रश्न मात्र उन लोगों के लिये है जो नेता-प्रतिनिधि आदि हैं अथवा जिन हिन्दुओं की मित्र सूची में ईसाई भी हैं वही दें और मात्र ईसाइयों को ही दें क्योंकि हिन्दू तो आंग्ल नववर्ष की बधाई का पात्र ही नहीं है।
साथ ही यह विचार करना भी आवश्यक है कि इस विषय के प्रति जागरूकता बढती जा रही है और अनेकों बार ऐसा होता है कि हम जिसे Happy New Year कहते हैं वह हमें Happy New Year प्त्युत्तर करके बधाई नहीं देता अपितु कहता है कि यह हमारा नववर्ष नहीं है अथवा तुम ईसाई हो क्या अथवा मैं ईसाई नहीं हूँ आदि इसी प्रकार का और भी कुछ। तो जब ऐसा देखने को मिल रहा है इसका तात्पर्य यह है कि हम उसे ठेंस पहुंचा रहे हैं, उसकी भावना को आहत कर रहे हैं और एक प्रकार से पाप के भी भागी बन रहे हैं। अस्तु हिन्दुओं को आंग्ल नववर्ष की बधाई तो कदापि न दें।
यदि आप प्रतिनिधि हैं और आपके इसाई मतदाता भी हैं अथवा आपके मित्र हैं तो आप चयनित करके मात्र उन्हीं को Happy New Year कहें। इसके साथ ही यह अवश्य ध्यान रखें कि जिनका नववर्ष नहीं है अर्थात जो बधाई के पात्र नहीं हैं उनको बधाई भी न दें, अनजाने में पाप के भागी न बनें।
क्या बधाई दें
अब बात आती है क्या बधाई दें तो यहां सबसे पहले जो विचारणीय विषय है वो यह कि हम अपने शब्दों में, अपनी भाषा में ही बधाई दें न कि उनकी भाषा और उनके शब्दों में Happy New Year कहकर दें। यदि उन्हें हमसे बधाई की आकांक्षा है तो हम अपनी भाषा और अपनी शब्दों में देंगे। यदि उन्हें हमारी भाषा और हमारे शब्दों में शुभकामना नहीं चाहिये तो हम इतने मूर्ख भी न बने उनकी भाषा और शब्दों में Happy New Year कहने लगें।

जब अपनी भाषा की बात आती है तो यहां यह समझना भी आवश्यक है कि सम्पूर्ण भारत में व्याप्त भाषा संस्कृत है भले ही सामान्य बोलचाल में प्रयोग न कर रहे हों, किन्तु जिस भाषा में भी बात कर रहे हैं उसकी जननी संस्कृत ही है। साथ ही संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है। अस्तु हमें संस्कृत भाषा में बधाई देने की आवश्यकता है ताकि हमारी पहचान भी प्रकट हो।
अब शब्दों की बात आती है तो शब्दों के साथ भावना की बात भी आती है क्योंकि भावना को भी शब्दों में प्रकट किया जायेगा। शुभकामना/मंगलकामना आदि से स्पष्ट होता है कि हमें उसके लिये कल्याण का भाव प्रकट करना चाहिये जिसमें नववर्ष का उल्लेख हो अर्थात यह भाव हो कि आपका नववर्ष आपके लिये कल्याणकारी हो, शुभ रहे आदि। कुछ उदाहरण :
- नववर्षस्य शुभाशयाः
- नववर्षं नवचैतन्यं ददातु
- नववर्षस्य शुभकामनाः
- नूतन वर्षं मंगलमस्तु
- अत्यद्भुतं ते भवतु अग्रिमं वर्षम्
- नूतनवर्षेऽस्मिन् शुभाशयाः सुखादनी। भवतु तव सर्वदा मंगलमयं जीवनम्॥
- सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु। सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु ॥
- सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥
तात्पर्य यह कि हम तो विश्व बंधुत्व का भाव रखते हैं और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के भाव से ओत-प्रोत हैं इसलिये जो स्वयं को हमसे भिन्न भी मानते हैं, आत्मकल्याण के मार्ग पर नहीं चल रहे हैं ईश्वर उसे भी सद्बुद्धि प्रदान करें ताकि वो भी आत्मकल्याण के मार्ग पर चलकर कल्याण के भागी बनें।
निष्कर्ष
स्वतंत्रता केवल भौगोलिक नहीं होती, वह वैचारिक भी होनी चाहिए। 1 जनवरी को “नया साल” मानना और मनाना कहीं न कहीं औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है। हमारी अपनी गणना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से है, जो खगोलीय (Astronomical) रूप से भी सटीक है, क्योंकि उस समय प्रकृति स्वयं को नव-पल्लवित कर रही होती है। इसलिये यदि आपके साथ इसाई मित्र/मतदाता आदि हैं तो आप मात्र उनको ही चयनित रूप से अपनी भाषा संस्कृत में उन्हें नववर्ष की शुभकामना प्रदान करें।
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