संक्रांति सर्वस्व - सूर्य संक्रमण एवं पुण्यकाल निर्णय का शास्त्रीय विवेचन

संक्रांति सर्वस्व – सूर्य संक्रमण एवं पुण्यकाल निर्णय का शास्त्रीय विवेचन

संक्रांति सर्वस्व – सूर्य संक्रमण एवं पुण्यकाल निर्णय का शास्त्रीय विवेचन : संक्रांति पुण्यकाल निर्धारण का विस्तृत शास्त्रीय विवेचन। मुहूर्त चिन्तामणि, निर्णय सिंधु और कृत्यसारसमुच्चय के आधार पर रात्रि संक्रांति, मकर व कर्क संक्रांति के सूक्ष्म गणितीय नियमों का अद्वितीय संकलन।

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नववर्षं नवचैतन्यं ददातु - नववर्ष 2026 किसका नववर्ष है, किसे बधाई दें, क्या बधाई दें - New Year 2026

नववर्षं नवचैतन्यं ददातु – नववर्ष 2026 किसका नववर्ष है, किसे बधाई दें, क्या बधाई दें – New Year 2026

नववर्षं नवचैतन्यं ददातु – नववर्ष 2026 किसका नववर्ष है, किसे बधाई दें, क्या बधाई दें – New Year 2026 – ईसाइयों का नया साल है हिन्दुओं का नहीं। 1 जनवरी से शुरू होने वाला नया साल ग्रेगोरियन कैलेंडर (Gregorian Calendar) पर आधारित है, जिसे वैश्विक स्तर पर प्रशासनिक और व्यावसायिक कार्यों के लिए अपनाया गया है। अतः 1 जनवरी को जिसे हम लोग भी नववर्ष के रूप में मनाने लगे हैं यह एक भ्रम है और इसे समझना आवश्यक है कि किसका नववर्ष है, किसे बधाई दें, क्या बधाई दें ?

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भारतीय काल गणना (kaalchakra) की अद्भुत व्यवस्था - अहोरात्र, मास, वर्ष, दिव्यवर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प

भारतीय काल गणना (kaalchakra) की अद्भुत व्यवस्था – अहोरात्र, मास, वर्ष, दिव्यवर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प

भारतीय काल गणना (kaalchakra) की अद्भुत व्यवस्था – अहोरात्र, मास, वर्ष, दिव्यवर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प : भारतीय शास्त्रों, विशेषकर ‘सूर्य सिद्धांत’, ‘मनुस्मृति’ और ‘श्रीमद्भागवत व अन्य पुराणों’ में काल (समय) की गणना अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक है। किन्तु इसे सही-सही समझना थोड़ा कठिन कार्य है जिसे यहां हम सरलता से समझने का प्रयास करेंगे। यहाँ समय रेखीय (Linear) न होकर चक्रीय (Cyclical) है और इसी कारण कालचक्र शब्द प्रयुक्त होता है। यहाँ भारतीय शास्त्रों के अनुसार युग व्यवस्था और मानवीय व दैवीय वर्षों के गणित पर विस्तृत आलेख प्रस्तुत है।

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भूमि शयन विचार - bhumi shayan vichar

भूमि शयन विचार – bhumi shayan vichar

भूमि शयन विचार – bhumi shayan vichar : भारतीय ज्योतिष शास्त्र और वास्तुशास्त्र में ‘भूमि शयन’ (bhumi shayan) एक ऐसी अवस्था है जो नक्षत्रों की शक्ति या काल की विशिष्ट प्रकृति के कारण पृथ्वी से संबंधित कार्यों (जैसे नींव खोदना, गृह निर्माण, खनन) के लिए निष्क्रिय या अशुभ मानी जाती है। यह अवस्था सीधे किसी एक नक्षत्र के नाम से नहीं, अपितु सूर्य-गोचर के सापेक्ष चन्द्र नक्षत्र के द्वारा निर्धारित होती है। यहां हम भूमि शयन विचार को शास्त्रोक्त प्रमाण के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे।

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देशांतर - Deshantar

देशांतर – Longitude

देशांतर – Deshantar : सभी पंचांगों में किसी न किसी स्थान विशेष के अक्षांश और रेखांश के आधार पर गणना की जाती है एवं उसमें दिये गये सूर्योदय-सूर्यास्त उसी स्थान विशेष के होते हैं। उस स्थान के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर सूर्योदयास्त में 4 मिनट का प्रतिरेखांश होता है इसी अंतर को देशांतर कहा जाता है।

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प्रज्ञा पंचांग देखने की विधि - Panchang dekhne ki vidhi

प्रज्ञा पंचांग देखने की विधि – Panchang dekhne ki vidhi

प्रज्ञा पंचांग देखने की विधि – Panchang dekhne ki vidhi : सभी पंचांगों की प्रथम सारणी में ऊपर के दाहिने कोने में मास, पक्ष, अयन, गोल, ऋतु, शुद्धाशुद्ध, काल दिशा एवं आंग्ल दिनांक आदि दिया जाता है। प्रज्ञा पंचांग में इसी का ध्यान रखते हुये ऊपर के दाहिने कोने में उपरोक्त विवरण दिया गया है।

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दृक पंचांग अर्थात् डिजिटल प्रज्ञा पंचांग की आवश्यकता - Need for Prajna Panchang

दृक पंचांग अर्थात् डिजिटल प्रज्ञा पंचांग की आवश्यकता – Need for Pragya Panchang/Drik Panchag

दृक पंचांग अर्थात् डिजिटल प्रज्ञा पंचांग की आवश्यकता – Need for Prajna Panchang : ऐसे दृक पंचांग (Drik Panchang) की आवश्यकता होती है जो उपयोगकर्ताओं के अनुकूल हो क्योंकि उपलब्ध दृक पंचांगों में अनेकों दोष देखे जाते हैं जिसके कारण उपयोगकर्ताओं के लिये ग्राह्य सिद्ध नहीं होते। इसी कारण प्रज्ञा पंचांग प्रकाशित किया जा रहा है जिसे अधिकाधिक दोषों का निवारण करते हुये उपयोगकर्ताओं के अनुकूल और सहज उपयोग के योग्य बनाने का प्रयास किया गया है।

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