ग्रहों की जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था और उनके फल – jagrat swapna sushupti

ग्रहों की जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था और उनके फल - jagrat swapna sushupti ग्रहों की जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था और उनके फल - jagrat swapna sushupti

ज्योतिष में फलादेश करते समय ग्रहों की अवस्था का ज्ञान होना बहुत ही महत्व रखता है। ग्रहों की अवस्था में दीप्तादि अवस्था, बालादि अवस्था का विचार मुख्यतः किया जाता है जिसका वर्णन बृहत्पराशरहोराशास्त्रम् में मिलता है। इसके साथ ही एक अन्य अवस्था का भी वर्णन मिलता है जो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति (jagrat swapna sushupti) अवस्था है। यहां हम ग्रहों के इन्हीं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्था को प्रामाणिक आधार पर समझने का प्रयास करेंगे।

अधिकांश ज्योतिष ग्रंथों में हमें ग्रहों के बालादि-दीप्तादि अवस्था का वर्णन देखने को मिलता है और इससे यह स्पष्ट होता है कि फलादेश में ग्रहों के बालादि और दीप्तादि अवस्था का विचार करना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इसके साथ ही बृहत्पराशर होराशास्त्र में यदि देखें तो अध्याय ४५ में ही बालादि अवस्था के पश्चात् जाग्रतादि अवस्था का भी वर्णन देखने को मिलता है जो इस प्रकार है :

स्वभोच्चयोः समसुहृद्भयोः शत्रुभनीचयोः ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या अवस्था नामदृक्फलाः ॥

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के अनुसार ग्रहों की तीन अवस्थाएं : जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति । ये तीनों अवस्थायें ग्रहों की राशियों में स्थिति के आधार पर निर्धारित की गयी हैं।

ग्रहों के लिये कुछ राशियां स्वयं की होती है अथवा उच्च, त्रिकोण आदि होती है, इसी प्रकार कुछ राशियां मित्रग्रहों की अथवा समग्रहों की होती हैं एवं कुछ शत्रुग्रहों की भी होती हैं एवं नीच राशि भी होती है। इन्हीं सभी राशियों को तीन वर्गों में रखते हुये ग्रहों की तीनों अवस्था का निर्धारण किया गया है।

  1. जाग्रत : जो ग्रह अपनी उच्च राशि में अथवा स्वराशि में हो उसकी जाग्रत अवस्था होती है।
  2. स्वप्न : जो गृह समग्रहों की अथवा मित्रग्रहों की राशि में हो उसकी स्वप्नावस्था होती है।
  3. सुषुप्ति : जो ग्रह शत्रु की राशि में हो अथवा नीच राशि में हो उसकी सुषुप्ति अवस्था होती है।

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति अवस्था के अनुसार फल

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् में जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था निर्धारण के पश्चात् वहीं आगे श्लोक ६ में इसके अनुसार फल विचार का भी सूत्र बताया गया है। ग्रहों के जाग्रतादि अवस्थाओं के अनुसार इस प्रकार फल का विचार करना चाहिये :

जागरे च फलं पूर्णं स्वप्ने मध्यफलं तथा।
सुषुप्तौ तु फलं शून्यं विज्ञेयं द्विजसत्तम ॥६॥

  1. जाग्रत : जाग्रत ग्रह अपना पूर्ण फल देते हैं, अर्थात जो ग्रह उच्च अथवा स्वगृही हो उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।
  2. स्वप्न : स्वप्नावस्था वाले ग्रह मध्यफल देते हैं अर्थात जो ग्रह समगृही या मित्रगृही हो वह अर्ध फल देता है।
  3. सुषुप्ति : सुषुप्त गृह शून्य फल देते हैं अर्थात जो ग्रह नीच हो या रिपुगृही हो शून्य फल देता है।

उपरोक्त फल विचार का और विस्तार उच्चादि ग्रहों का फल विचार करने से ज्ञात होता है और थोड़ा विरोधभास भी लगता है, किन्तु वास्तव में वह विस्तार है। जैसे यहां उच्च और स्वगृही ग्रह की जाग्रत अवस्था कही गयी है और उसका पूर्ण फल बताया गया है, किन्तु उच्चादि ग्रह फल में उच्च ग्रह का पूर्ण फल व स्वगृही ग्रह का अर्ध फल बताया गया है।

इसी प्रकार मित्रगृही और समगृही की स्वप्नावस्था बताई गयी है और अर्ध फल कहा गया है, किन्तु उच्चादि ग्रह विचार में मित्रगृही का पाद फल और समगृही का पदार्ध फल कहा गया है। सुषुप्ति में शून्य फल है एवं उच्चादि विचार करने पर भी शून्य ही है। किन्तु वहां और विस्तार विपरीत क्रम से दुष्टफल विचार का भी प्राप्त होता है।

निष्कर्ष : इस प्रकार यदि निष्कर्ष तक पहुंचना चाहें तो ऐसा प्रतीत होता है जब स्थूल व आंशिक विचार करना हो, तो जाग्रतादि अवस्था से विचार किया जा सकता है किन्तु जब सूक्ष्म व विस्तृत विचार करना हो तो उच्चादि ग्रहों के फलानुसार विचार करना चाहिये।

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