संक्रांति सर्वस्व – सूर्य संक्रमण एवं पुण्यकाल निर्णय का शास्त्रीय विवेचन

संक्रांति सर्वस्व - सूर्य संक्रमण एवं पुण्यकाल निर्णय का शास्त्रीय विवेचन संक्रांति सर्वस्व - सूर्य संक्रमण एवं पुण्यकाल निर्णय का शास्त्रीय विवेचन

भारतीय काल-गणना में सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश ‘संक्रांति’ कहलाता है। यह केवल एक खगोलीय घटना मात्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा के रूपांतरण का ‘संधि-काल’ है। शास्त्रों में इस काल की सूक्ष्मता को समझते हुए स्नान, दान और तर्पण हेतु ‘पुण्यकाल’ के कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं। प्रस्तुत आलेख “संक्रांति सर्वस्व” विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथों जैसे मुहूर्त चिन्तामणि, निर्णय सिंधु और कृत्यसारसमुच्चय के प्रकाश में संक्रांति निर्णय की विसंगतियों को दूर करने का एक अद्वितीय प्रयास है।

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“भारतीय मनीषियों ने काल को केवल अंकों की गणना नहीं, बल्कि चेतना के प्रवाह के रूप में देखा है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश अर्थात् ‘संक्रांति’, ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संचरण का वह विशिष्ट क्षण है जिसे शास्त्रों में ‘संधि-काल’ की संज्ञा दी गई है। वर्तमान युग में पंचांगीय गणनाओं और संक्रांति की तिथियों को लेकर व्याप्त भ्रमों के बीच, ‘संक्रांति सर्वस्व’ एक ऐसे प्रामाणिक प्रकाश-स्तंभ के रूप में प्रस्तुत है, जो मुहूर्त चिन्तामणि, निर्णयसिंधु और वशिष्ठ संहिता जैसे कालजयी ग्रंथों के उद्धरणों के माध्यम से पुण्यकाल निर्धारण के सूक्ष्म गणितीय और आध्यात्मिक रहस्यों को उद्घाटित करता है।”

मुहूर्त चिन्तामणि के अनुसार पुण्यकाल निर्णय

सर्वप्रथम विषय कि पुण्यकाल कितना होता है तो इसका निर्धारण है ३२ घटी। अन्यत्र ३३ घटी भी मिलता है जैसे “तद्योगाच्चाप्यधश्चोर्द्धं त्रिंशन्नाड्यः प्रकीर्त्तिताः” (वीरमित्रोदय – देवल) तो ३२ घटी वाला पक्ष यत्र-तत्र-सर्वत्र मिलता है। यह निर्धारण मुख्य रूप से रात्रि में संक्रांति होने पर पुण्यकाल निर्णय करने के लिये है क्योंकि यदि दिन में संक्रांति हो तो सम्पूर्ण दिन ही पुण्यकाल होता है।

मुहूर्त चिन्तामणि के अनुसार पुण्यकाल निर्णय

संक्रान्तिकालादुभयत्र नाडिकाः पुण्या मताः षोडश षोडशोष्णगोः ।
निशीथतोऽर्वागपरत्र संक्रमे पूर्वापराहान्तिमपूर्वभागयोः ॥

ऐसे और भी बहुशः प्रमाण मिलते हैं जो संक्रांति के पूर्व और पर १६-१६ घटी पुण्यकाल सिद्ध करते हैं और यहां ध्यातव्य यह भी है कि यहां घटी का तात्पर्य २४ मिनट न होकर रात्रि का ३०वां भाग होगा। अन्यथा जिस संक्रांति में रात्रिमान ३३ घटी या अधिक हो और संक्रांति यदि निशीथ काल में हो तो किसी भी दिन पुण्यकाल की सिद्धि नहीं होगी। एवं ३३ घटी पुण्यकाल वाला पक्ष इसी तथ्य को और अधिक स्पष्ट करता है जिससे रात्रि में संक्रांति होने पर पुण्यकाल का निर्धारण कैसे किया जाय ?

३३ घटी के अनुसार १६.५ घटी संक्रांति के पूर्व और पर सिद्धि होती है किन्तु १६ घटी वाला पक्ष सर्वमान्य है जिसके अनुसार संक्रांति का पुण्यकाल ३२ घटी होता है।

  • सङ्क्रान्तौ पुण्यकालस्तु षोडशोभयतः कलाः ॥
  • पुण्यः कालोऽर्कसङ्क्रान्तेः प्राक्पश्चादपि षोडश ॥ (वीरमित्रोदय) स्कन्दपुराण
  • पुण्यकालो विष्णुपद्याः प्राक्पश्चादपि षोडश ॥ (वीरमित्रोदय) स्कन्दपुराण

आगे रात्रि में तीन प्रकार से पुण्यकाल का निर्धारण किया जाता है :

  • प्रथम : निशीथ काल से पूर्व हो तो पूर्व दिन परार्द्ध में।
  • द्वितीय : यदि निशीथ काल के पश्चात हो तो पर दिन पूर्वार्द्ध में और

पूर्णे निशीथे यदि संक्रमः स्याद्दिनद्वयं पुण्यमथोदयास्तात् ।
पूर्वं परस्तात् यदि याम्यसौम्यायने दिने पूर्वपरे तु पुण्ये ॥

  • तृतीय : यदि निशीथकाल में ही हो (रात्रि का आठवां मुहूर्त) तो दोनों ही दिन पूर्व दिन के परार्द्ध और पर दिन के पूर्वार्द्ध में होता है।

किन्तु यहां “पूर्वं परस्तात् यदि याम्यसौम्यायने दिने पूर्वपरे तु पुण्ये” कथन से याम्य (कर्क) और सौम्य (मकर) संक्रांति के लिये पृथक सूत्र ज्ञात होता है और वो यह कि यदि रात में संक्रांति हो तो कर्क का पूर्व दिन परार्द्ध में और मकर का पर दिन पूर्वार्द्ध में ही पुण्यकाल होगा।

सन्ध्या त्रिनाडीप्रतिमार्कबिम्बादर्थोदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र ।
चेद्याम्यसौम्ये अयने क्रमात् स्तः पुण्यौ तदानीं परपूर्वघस्रौ ॥

कर्क और मकर संक्रांति हेतु कुछ और विशेषता भी वर्णित है। रात्रि में हो तो ही इस प्रकार से निर्धारण करे न कि संध्या में संक्रांति होने पर। संध्या को स्पष्ट इस प्रकार किया गया है “सन्ध्या त्रिनाडीप्रतिमार्कबिम्बादर्थोदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र” अर्थात प्रातः संध्या सूर्य बिम्बोदय (अर्ध उदय) से तीन घटी पूर्व और सायं संध्या सूर्यास्त (अर्ध अस्त) से तीन घटी पश्चात् तक होता है और “चेद्याम्यसौम्ये अयने क्रमात् स्तः पुण्यौ तदानीं परपूर्वघस्रौ” यदि प्रातः संध्या में कर्क संक्रांति हो तो पर दिन सम्पूर्ण और यदि सायं संध्या में मकर संक्रांति हो तो पूर्वदिन सम्पूर्ण पुण्यकाल होता है।

अब आगे संक्रांतियों का पुण्यकाल किस भाग में माने इसको भी स्पष्ट किया गया है, यहां ध्यान इस तथ्य का रखना आवश्यक है कि यह विचार विशेष रूप से नहीं किया जाता है किन्तु करना चाहे हो कर सकता है एवं इसका विचार करें तो जिस भाग में भी पुण्यकाल ज्ञात हो उस भाग में सम्पूर्ण अर्थात ३२ घटी होगा न कि १६ घटी। तीन भाग होते हैं पूर्व, मध्य और पर। पूर्व का तात्पर्य संक्रांति से पूर्व ३२ घटी, मध्य का तात्पर्य संक्रांति के पूर्व-पर १६-१६ घटी और पर का तात्पर्य संक्रांति के पश्चात् ३२ घटी होगा।

मुहूर्त गणपति
मुहूर्त गणपति

याम्यायने विष्णुपदे आद्या मध्या तुलाजयोः ।
षडशीत्यानने सौम्ये परा नाड्योऽतिपुण्यदाः ॥

याम्य (कर्क) और विष्णुपद संक्रांति में पूर्व, तुला और मेष में मध्य एवं सौम्य (मकर) और षडशीति में पर पुण्यकाल होता है।

निर्णय सिंधु के अनुसार पुण्यकाल निर्णय

प्रागूर्ध्वाद्दशपूर्वतः षडवनिस्तद्वत्परः पूर्वतस्त्रिंशत्षोडशपूर्वतोथपरतः पूर्वाः पराः स्युर्दश।
पूर्वाः षोडशचोत्तराऋतुभुवः पश्चात्खवेदाः पुनः पूर्वाः षोडशचोत्तराः पुनरथोपुण्यास्तुमेपादितः॥

:- हेमाद्रि मतानुसार

इसमें राशियों के अनुसार प्रत्येक संक्रांति के लिये विशेष घटी स्पष्ट किया गया है किन्तु ऐसा विचार सामान्यतः नहीं किया जाता है और आगे पुनः ऐसे श्लोक प्राप्त होंगे जिसमें इसका विचार भी करेंगे।

परा विंशतिः कुंभेपूर्वाः षोडशमीनेपराः षोड शेत्यर्थः ।
याप्युत्तरापुण्यतमामयोक्तासायंभवेत्सायदिसापिपूर्वा ॥
पूर्वा सुयोक्तायदिसाविभाते साप्युत्तरारात्रिनिषेधतः स्यात् ॥
अर्वानिशीथा द्यदिसंक्रमः स्यात्पूर्वेह्निपुण्यंपरतः परेह्नि ।
आसन्नयामद्वयमेवपुण्यंनिशी थमध्येतुदिनइयंस्यात् ॥
कर्केझषेप्येवमितिह्युवाच हेमाद्रिसूरिश्चतथाऽपरार्कः ॥

निर्णयसिंधु (हेमाद्रि, अपरार्क)

झषप्रदोषेयदिवार्धरात्रेपरेह्निपुण्यंत्वथकर्कटश्चेत् ॥
प्रभातकाले यदिवानिशीथे पूर्वेह्निपुण्यंत्वितिमाधवार्यः ॥

निर्णयसिंधु (माधव)

इस प्रकार संक्रांति के पुण्यकाल निर्णय में निर्णयसिन्धुकार हेमाद्रि, माधव और अपरार्क के मतों को ग्रहण करते हुये एक विशेष निर्णय प्रस्तुत करते हैं किन्तु विशेष विश्लेषण आदि नहीं करते हैं।

कृत्यसारसमुच्चय के अनुसार पुण्यकाल निर्णय

कृत्यसारसमुच्चय में संक्रांति निर्णय पर विस्तृत विमर्श प्राप्त होता है जिसको गंभीरता से समझना आवश्यक हो जाता है। चूंकि हम इसी भाग में गंभीरता से अवलोकन करेंगे इसलिये यहां वीरमित्रोदय ग्रन्थ का पक्ष भी प्रस्तुत करेंगे और साथ ही नारद संहिता, वशिष्ठ संहिता का भी आश्रय लेंगे।

संक्रान्तिसमयः सूक्ष्मो दुर्जेयः पिशितेक्षणैः ।
मुख्यालामे तु गौणेऽपि कार्या दानादिका क्रिया ॥

कृत्यसारसमुच्चय (देवल)

प्रथम वचन देवल का बताया गया है जिसमें संक्रांति के सूक्ष्म समय को ज्ञात करना असंभव कहा गया है और मुख्य समय का ज्ञान न होने पर “मुख्याभावे प्रतिनिधिः” से स्नान-दान आदि करे और इसी काल के लिये विशेष रूप से पर-पूर्व का विचार किया जाता है।

इससे एक भाव यह भी स्पष्ट होता है कि संक्रांति के जितने निकटतम काल को ग्रहण किया जाय उतना ही अधिक पुण्यकर होता है। किन्तु ये तो दिन में ही संभव है रात्रि में तो विशेष विचार करना ही होगा और संक्रांति के पुण्यकाल को लेकर जितने भी विमर्श होते हैं उसमें से तीन चौथाई रात्रि संक्रांति परक ही होते हैं।

नारद संहिता - २
नारद संहिता – २

अब कृत्यसारसमुच्चय का ये श्लोक जो कि वशिष्ठ संहिता का बताया गया है उसका स्क्रीन शॉट भी यहां इस जिससे इसकी विश्वसनीयता बढे।

क्योंकि ढेरों अप्रमाणिक पुस्तकों का अवलोकन करने पर प्रामाणिक पुस्तकें भी संदिग्ध लगने लगती हैं। यहां वशिष्ठ संहिता के संक्रांति प्रकरण में श्लोक संख्या ११ वही है (किञ्चित अंतर) जो कृत्यसार समुच्चय में दिया गया है। अर्थात कृत्यसार समुच्चय जैसी पुस्तकें प्रामाणिक हैं।

दिनपतिसंक्रमणात्प्राक्षोडश नाड्यश्च पुण्यकालः स्यात् ।
परतः षोडशः नाड्यः सर्वत्र स्नानहोमदानेषु ॥

:~ कृत्यसारसमुच्चय (वशिष्ठ संहिता)

वशिष्ठ संहिता - १
वशिष्ठ संहिता – १

जो पूर्व-पर १६+१६ (= ३२) घटी वाला जो सामान्य पक्ष है प्रथम वही तथ्य कृत्यसारसमुच्चय भी स्पष्ट करता है और इसके लिये वह वशिष्ठ संहिता का प्रमाण प्रस्तुत करता है जो ऊपर आपने अवलोकन किया।

पुनः आगे मुहूर्त चिंतामणि का श्लोक जो पूर्व दिया गया है “याम्यायने पुण्यदाः” वो प्रस्तुत करता है जिसका तात्पर्य है याम्य (कर्क) और विष्णुपद (सिंह, वृश्चिक, वृष, कुम्भ) की आदि (३२), तुला और मेष का मध्य अर्थात पूर्व और पर १६+१६ , षडशीति (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) और सौम्य (मकर) का पर (३२) पुण्यकाल होता है। यहां आपको ३२ दण्ड वाला तथ्य किञ्चित भ्रामक लग सकता है किन्तु इसको आगे और अधिक समझते रहेंगे।

यदि हम १६+१६ = ३२ दण्ड वाला सामान्य पक्ष ग्रहण न करें तो आगे अनेकों प्रमाण ऐसे मिलते हैं जिससे हम भ्रमित ही होते चले जायेंगे किन्तु किसी निर्णय पर स्थिर न हो पाएंगे।

कर्कटे विंशतिः पूर्वा मकरे विशतिः पराः ।
वर्त्तमाने तुलामेषे नाड्यस्तुभयतो दश ॥

:~ कृत्यसारसमुच्चय (गार्ग्य)

यहां २० दण्ड का पक्ष है जिसके अनुसार कर्क का पूर्व, मकर का पर और तुला एवं मेष का पूर्व १० एवं पर १० दण्ड बताया गया है, शेष राशियों के लिये वही १६+१६ = ३२ का सामान्य नियम है। मेष-तुला (गोल) व कर्क-मकर के लिये ३२ दण्ड पुण्यकाल नहीं अपितु २० दंड के पुण्यकाल का निर्धारण किया गया है। इस निर्धारण को भलीभांति समझें ३२ दण्ड का पक्ष भी थोड़ा स्पष्ट हो जायेगा। इस पक्ष को ग्रहण करने पर निशीथ से पुण्यकाल का दिन में सिद्धि वाला पक्ष खण्डित होता है।

अस्तु यह उस पक्ष के विषय में है जो रात्रि में भी पुण्यकाल की सिद्धि करता है। क्योंकि यदि निशीथ में मेष व तुला की संक्रांति हो तो उसके २० घटी में से एक भी घटी ऐसा नहीं होगा जो दिन के किसी भाग को स्पर्श करता हो। रात्रि में पुण्यकाल निर्धारण का यही विशेष सूत्र है कि जो पुण्यकाल की घटियां बताई गयी है वह दिन के जिस भाग का जब स्पर्श करे तब उस भाग में पुण्यकाल होता है।

इसी प्रकार यदि कर्क की संक्रांति रात २१ घटी के पश्चात् हो तो उसका पुण्यकाल किसी भी दिन के किसी भी भाग का स्पर्श नहीं करेगा। अर्थात यह प्रमाण उक्त पक्ष के लिये है जो रात्रि में भी पुण्यकाल ग्रहण करते हैं।

त्रिंशतिः कर्कटे नाड्याः मकरस्य दशाधिकाः ।
तुलामेषस्य विंशो स्यात् शेषाः षोडश षोडश ॥

:~ ज्योतिष सर्व संग्रह

यहां ज्योतिष सर्वसंग्रह का वह वचन है जो कर्क के आदि की ३० घटी और मकर के अन्त्य की ४० घटी को पुण्यकाल बताता है जिससे ३२ घटी वाला पक्ष सबल हो जाता है। पुनः प्रश्न आएगा कि ज्योतिष तत्व सुधार्णव में तो जो पृष्ठ यहां संलग्न भी है; उसमें वृद्ध वशिष्ठ के वचन से कर्क का ३० और मकर का २० ही कहा गया है तो यह अर्द्धश्लोक मात्र है और संदर्भ को प्रकट नहीं कर रहा है संभवतः इसका संदर्भ पूर्व और पर दोनों हो।

ज्योतिष तत्व सुधार्णव
ज्योतिष तत्व सुधार्णव

भवनान्तं बिम्बमध्यं रात्र्यर्द्धात् प्रागुदेति चेत् ।
स्नानदानादि मध्याह्नादूर्ध्वं कुर्याद्गते दिने ॥
रात्र्यर्धादुपरि क्षेत्रं याति चेदन्यथाऽर्यमा ।
अन्यगामिनि मध्याह्नात्पूर्व स्नानादि पुण्यदम् ॥

:~ कृत्यसारसमुच्चय (ब्रह्मसिद्धांत)

रात्रौ सङ्क्रमणे भानोर्दिवा कुर्यात्तु तत्क्रियां ।
:~ (वीरमित्रोदय) गोभिल

यहाँ अब आगे यह स्पष्ट होता है कि भले ही कोई पक्ष ऐसा हो जो रात में भी पुण्यकाल को ग्रहण करता हो किन्तु अधिकांश पक्ष रात में संक्रांति होने पर भी पुण्यकाल को दिन में ही सिद्ध करता है और यही पक्ष बलवान है। एवं २० घटी वाला जो भी पक्ष है वह रात्रि में पुण्यकाल से ही सम्बंधित प्रतीत होता है।

ज्योतिष तत्व सुधार्णव 0
ज्योतिष तत्व सुधार्णव 0

मेषसंक्रमणे प्रागपराः दश दश घटिकाः पुण्याः । वृषसंक्रमणे पूर्वाः षोडश घटिकाः पुण्याः ॥
मिथुनसंक्रमणे पराः षोडश घटिकाः । कर्कसंक्रमणे पूर्वात्रिंशद्घटिकाः ॥
सिंहसंक्रमणे पूर्वाः षोडश घटिकाः । कन्यासंक्रमणे पराः षोडश घटिकाः ॥
तुलासंक्रमणे प्रागपराः दश दश घटिकाः । वृश्चिकसंक्रमणे पूर्वाः षोडश घटिकाः॥
धनुःसंक्रमणे पराः षोडश घटिकाः । मकरसंक्रमणे पराश्चत्वारिंशद् घटिकाः ॥
कुम्भसंक्रमणे पूर्वाः षोडश घटिकाः । मीनसंक्रमणे पराः षोडश घटिकाः पुण्याः॥ 

:~ कृत्यसारसमुच्चय

अब कृत्यसार समुच्चय में विभिन्न राशियों के लिये विशेष घटी वाला पक्ष भी बताया गया है जो अवलोकनीय है किन्तु इसको ग्रहण नहीं किया जाता है। किन्तु यहां भी हम देखते हैं कि कर्क के लिये ३० घटी पूर्व और मकर के लिये ४० घटी पर कहा गया है। अन्य राशियों का विचार कर लें यदि करना हो तो।

सङ्क्रमस्तु निशीथे स्यात्षड्यामाः पूर्वपश्चिमाः ।
सङ्क्रान्तिकालो विज्ञेयस्तत्र स्नानादिकं चरेत् ॥

:~ (वीरमित्रोदय) भविष्योत्तरपुराण

वीरमित्रोदय में भविष्यपुराण से तो एक वचन ऐसा भी मिलता है जो यदि निशीथ में संक्रांति हो तो पूर्व और पर ४५ घटी (षड्याम ६ प्रहर अर्थात १८ घंटा) भी कहता है। इसका मूल भाव वही है कि यदि निशीथ में संक्रांति हो तो दोनों ही दिन पुण्यकाल स्पर्श करेगा और दोनों ही दिन पुण्यकाल मान्य होगा।

ज्योतिष तत्व सुधार्णव १
ज्योतिष तत्व सुधार्णव १

अब आगे रात्रि में संक्रमण होने पर उसके पुण्यकाल का निर्धारण करने के नियम स्पष्ट हो जाते हैं और अन्य प्रमाण भी आगे प्रस्तुत हैं :

यद्यर्धरात्र एव स्यात्सम्पूर्णे संक्रमो रवेः । तदा दिनद्वयं पुण्यं स्नानदानादिकर्मसु ॥ कृत्यसारसमुच्चय

मीनार्धं भास्करे पुण्यमपूर्णे शर्वरीदले । सम्पूर्णे तुभयोर्देयमतिरेके परेऽहनि ॥ कृत्यसारसमुच्चय

पूर्णे चेदर्धरात्रे तु यदा संक्रमते रविः । प्राहुर्दिनद्वयं पुण्यं मुक्त्वा मकरकर्कटौ ॥ कृत्यसारसमुच्चय

उपरोक्त प्रमाणों से यह ज्ञात होता है कि यद्यपि विभिन्न राशियों के लिये भिन्न-भिन्न घटियां पुण्यकाल के लिये निर्धारित की गयी हैं तथापि एक सामान्य नियम जो कि सर्वमान्य है वो यह कि यदि रात्रि में सूर्य संक्रमण करे तो तीन प्रकार से पुण्यकाल का निर्धारण करे । किन्तु इसके लिये पहले निशीथ काल को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है। निशीथ काल से तात्पर्य रात्रि का आठवां मुहूर्त है अर्थात मध्य रात्रि के पूर्व और पर एक-एक घटी। द्वितीय प्रहर कि अंतिम घटी और तृतीय प्रहर के आदि कि प्रथम घटी को संयुक्त रूप से निशीथ काल कहा गया है जो रात्रि का आठवां मुहूर्त होता है।

  • प्रथम : निशीथ काल से पूर्व संक्रमण हो तो पूर्व दिन परार्द्ध में पुण्यकाल।
  • द्वितीय : निशीथ काल के पश्चात् संक्रमण हो तो पर दिन के पूर्वार्द्ध में पुण्यकाल।
  • तृतीय : निशीथकाल में ही संक्रमण हो तो दोनों दिन अर्थात पूर्व दिन के उत्तरार्द्ध में और पर दिन के पूर्वार्द्ध में पुण्यकाल।
ज्योतिष तत्व सुधार्णव २
ज्योतिष तत्व सुधार्णव २

किन्तु ध्यातव्य यह है कि ये जो सामान्य नियम है वो कर्क और मकर संक्रमण के अतिरिक्त है – “मुक्त्वा मकरकर्कटौ” , अर्थात कर्क और मकर संक्रमण यदि रात्रि में हो तो पुण्यकाल के लिये कुछ विशेष नियम है।

यदाऽऽस्तमनवेलायां मकरं याति भास्करः । प्रदोषे चार्धरात्रे वा स्नानं दानं परेऽहनि ॥
अर्धरात्रे तदूर्ध्वे वा संक्रान्तौ दक्षिणायने । पूर्वमेव दिनं ग्राह्यं यावन्नोद्यते रविः ॥

:~ कृत्यसारसमुच्चय (वृद्धगार्ग्य)

यद्यस्तमनवेलायां मकरं याति भास्करः । प्रदोषे चार्धरात्रे वा स्नानं दानं परेऽहनि ॥
:~ कृत्यसारसमुच्चय (भविष्य पुराण)

ये प्रमाण हैं जो ऊपर दिये गए हैं अथवा संलग्न नारद संहिता का पृष्ठ है अथवा और भी हैं जो इस प्रकार से स्पष्ट करते हैं : यदि रात में भले ही वह प्रदोष काल हो अथवा निशीथकाल हो अथवा सूर्योदय तक का भाग हो उसमें यदि कर्क या मकर संक्रांति हो तो कर्क संक्रांति का पुण्यकाल पूर्व दिन परार्द्ध में ही होगा और यदि मकर संक्रांति हो तो पर दिन पूर्वार्द्ध में होगा।

किन्तु यहां पर हमें पुनः मुहूर्त चिंतामणि का वह वचन जो संध्या काल में संक्रांति के नियम बताता है उसकी भी संगति लगाने की आवश्यकता है अर्थात तात्पर्य यह है कि सायं संध्या और प्रातः संध्या के मध्य में यदि कर्क या मकर संक्रमण हो तो ही पूर्व या पर दिन ग्राह्य होगा। संध्या काल में संक्रमण होने पर संध्या काल के जो विशेष नियम है।

यहां संलग्न किये गए नारद संहिता के भी श्लोक १७, १८ और १९ से यही स्पष्ट होता है कि :

नारद संहिता - १
नारद संहिता – १

सायं संध्या पूर्व दिन का स्पर्श करती है इस कारण पूर्व दिन ही संपूर्ण पुण्यकाल भले ही वह मकर संक्रमण क्यों न हो और प्रातः संध्या पर दिन का स्पर्श करती है इस कारण प्रातः संध्या में कर्क संक्रमण हो तो उसका भी पुण्यकाल पर दिन ही सम्पूर्ण होगा। यहां संध्या को एक प्रकार से दिन का ही अंश माना गया है।

ये विशेष नियम कर्क और मकर के लिये इसी कारण स्पष्ट किया गया है जिससे विपरीत ग्रहण न किया जाय। अन्य संक्रमण में तो सामान्य नियम से ऐसा ही होगा। “अहः पुण्यं” से सम्पूर्ण दिन की ही सिद्धि होती है एवं मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार भी सम्पूर्ण दिन की ही सिद्धि होती है, पूर्वार्द्ध या परार्द्ध की नहीं।

दिन में संक्रांति हो तो सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल होता है

यहां से हम दिन में संक्रमण होने पर संपूर्ण दिन पुण्यकाल की सिद्धि के विषय में प्रवेश करते हैं। एक सीधी सी बात है दिन का पूर्वार्द्ध या परार्द्ध इसका विचार मात्र रात्रि संक्रमण होने पर किया गया है दिन के संक्रमण में नहीं किन्तु यह चिंताजनक है कि ऐसा विचार दिन में भी किया जाता है अपितु पंचांगकार दिन में संक्रमण होने पर कब कौन सा नियम ग्रहण करते हैं और कैसे कर लेते हैं यह भी चिंताजनक है।

दिन में संक्रांति हो तो सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल होता है

“अहः पुण्यं” से यदि संध्या में भी संक्रमण हो तो स्पर्श करने वाले सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल की सिद्धि हो जाती है, यदि दिन में ही संक्रमण हो तब तो विचार ही क्या करना ? इसके साथ और भी अनेकों स्पष्ट प्रमाण हैं जो यदि दिन में संक्रमण हो तो सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल मान्य सिद्ध करता है।

अह्नि संक्रमणे पुण्यमहः कृत्स्नं प्रकीर्त्तितम् । रात्रौ संक्रमणे भानोर्दिनार्द्धं स्नानदानयोः ॥
अर्द्धरात्रादधस्तस्मिन् मध्याह्नस्योपरि क्रिया । ऊर्ध्वं संक्रमणे चोर्ध्वमुदयात्प्रहरद्वयम् ॥

:~ कृत्यसारसमुच्चय (वृद्धवशिष्ठ) (वीरमित्रोदय)

  • “अह्नि संक्रमणे पुण्यमहः कृत्स्नं प्रकीर्त्तितम्” – दिन में संक्रमण हो तो संपूर्ण दिन पुण्यकाल होता है। शेष सभी विचार रात्रि संक्रमण के लिये है जो ऊपर कर चुके हैं।
  • पुनः नारद संहिता का भी ऊपर संलग्न पृष्ठ में अवलोकन कर सकते हैं श्लोक संख्या १७ – “अहः संक्रमणे कृत्स्नं महत्पुण्यं प्रकीर्त्तितम्” – दिन में संक्रमण हो तो संपूर्ण दिन महापुण्यकाल होता है।

इस प्रकार यहां तीन प्रमाणों से दिन में संक्रमण होने पर सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल की सिद्धि होती है। किन्तु इतने प्रमाणों में से कोई एक प्रमाण भी ऐसा नहीं है जो दिन में संक्रांति होने पर पुण्यकाल के लिये पूर्वार्द्ध-परार्द्ध आदि को स्पष्ट करता हो। जो घटियां बताई गयी हैं वो वास्तव में रात्रि संक्रमण के पुण्यकाल को ही स्पष्ट करने के लिये हैं अर्थात पुण्यकाल की वर्णित घटी दिन के जिस भाग (पूर्वार्द्ध-परार्द्ध) में पड़े (रात्रि में संक्रमण होने पर) उस भाग में पुण्यकाल मान्य होगा।

विशेष पक्ष : जिसको ग्रहण नहीं किया गया है

अब अंत में दो विशेष पक्ष जिसको संक्रांति निर्णय में ग्रहण नहीं किया गया उसका भी अवलोकन करेंगे। चूंकि उपरोक्त प्रमाणों से पूर्णतः संक्रांति का पुण्यकाल निर्धारित हो जाता है और इन दोनों नियमों से पुनः विसंगति उत्पन्न होने की ही संभावना हो जाती है एवं इसके समर्थन में अन्यत्र कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता इसलिये इसको ग्रहण नहीं किया जाता है।

धनुर्मीनावतिक्रम्य कन्यां च मिथुनं तथा । पूर्वापरविभागेन रात्रौ संक्रमणं यदा ॥
दिनान्ते पञ्चनाड्यस्तु तदा पुण्यतमाः स्मृताः। उदयेऽपि तथा पञ्च दैवे पित्र्ये च कर्मणि ॥

:~ कृत्यसारसमुच्चय

धनु, मीन, कन्या और मिथुन इन चार संक्रांतियों में (अथवा इससे अन्य संक्रांतियों का भी बोध होता हो तो उनके साथ) यदि ये रात्रि में हों तो उपरोक्त नियमानुसार पुण्यकाल के लिये दिन का ग्रहण तो करे किन्तु संपूर्ण परार्द्ध या पूर्वार्द्ध नहीं अपितु जिस भाग में पुण्यकाल सिद्ध हो उसमें मात्र ५ घटी ही ग्रहण करे।

अब आगे देवीपुराण का भी एक प्रमाण मिलता है जो कुछ और विशेष नियम बताता है किन्तु हमें नहीं लगता है कि किसी भी पंचांग में इसको ग्रहण किया जाता है।

आदौ पुण्यं विजानीयात् यद्यभिन्ना तिथिर्भवेत् । अर्धरात्रे व्यतीते तु विज्ञेयमपरेऽहनि ॥
:~ कृत्यसारसमुच्चय (देवीपुराण)

देवीपुराण का यह वचन एक मात्र मकर संक्रांति के विषय में ही प्रतीत होता है क्योंकि यहां अर्धरात्रि से पूर्व संक्रमण होना बताया गया है और अन्य सभी संक्रांतियां यदि निशीथ पूर्व हों तो पूर्व दिन ही परार्द्ध में पुण्यकाल सिद्ध हो चुका है एक मकर संक्रांति के अतिरिक्त। क्योंकि मकर संक्रांति के लिये तो यही सिद्ध हो पाया है कि यदि सायं संध्या में संक्रमण हो तो पूर्व दिन सम्पूर्ण और यदि सायं संध्या के पश्चात् रात्रि के किसी भी काल में हो तो अगले ही दिन पुण्यकाल होगा।

किन्तु यह श्लोक यहां पर तिथि से संबंध स्थापित करते हुये अर्द्धरात्रि से पूर्व का एक विशेष नियम प्रस्तुत करता है। यदि मकर संक्रमण अर्द्धरात्रि से पूर्व हो तो जो संक्रमण काल की तिथि हो वही तिथि यदि पूर्व दिन भी प्राप्त हो उस परिस्थिति में पूर्व दिन के उत्तरार्द्ध में ही पुण्यकाल होगा। अर्द्धरात्रि के पश्चात् यह नियम नहीं होगा।

यदि ग्रहण करने की इच्छा हो तो इस विशेष नियम को भी ग्रहण किया जा सकता है, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि इस नियम को कोई भी प्रंचागकार ग्रहण नहीं करते हैं। किन्तु समस्या तो यह है कि पंचांगकार किन-किन नियमों को ग्रहण करते हैं और कब पलट जाते हैं यह उन्हें भी ज्ञात नहीं होता। अदृश्य पंचनकारों के विषय में तो चर्चा ही क्या करें ?

मुख्याभावे प्रतिनिधिः

अब हम उपसंहार में प्रवेश कर रहे हैं और यहां हम उपरोक्त विश्लेषण का वो निष्कर्ष संक्षेप में समझेंगे कि किस परिस्थिति में पुण्यकाल का क्या निर्धारण किया जायेगा। ध्यातव्य यह है कि इन्हीं प्रमाणों का अनर्थ करते हुये अन्य पक्ष भी स्थापित किया जाता है किन्तु हमने यहां इन प्रमाणों पर व्यापक विमर्श करके निम्न तथ्यों को सिद्ध किया है :

दिन में संक्रांति : यदि दिन में संक्रांति हो तो संपूर्ण दिन पुण्यकाल होता है, न कि पूर्वार्द्ध अथवा परार्द्ध। विभिन्न संक्रांतियों के पुण्यकाल की जो विशेष घटियां बताई गयी है; मुख्य रूप से १६+१६ = ३२ वो रात्रि में संक्रमण हो तो उसके पुण्यकाल का निर्धारण करने के लिये है न कि दिन में पुण्यकाल निर्धारण करने के लिये।

रात्रि में संक्रांति : यदि रात्रि में संक्रांति हो तो वहां हमें उस विशेष पुण्यकाल की घटियों का विचार करके निर्धारण करना होता है जो कि बताई गयी है १६+१६ = ३२, इसके अतिरिक्त हमें ३० (कर्क) ४० (मकर) घटी वाले पक्ष की आवश्यकता तब होती है जब हम सामान्य रूप से घटीगणना करें। यदि हम रात्रिमान को ३० घटी मान कर इस नियम से निर्धारण करेंगे तो उक्त विशेष नियम की भी आवश्यकता नहीं होती है।

रात्रि में संक्रांति होने पर पुण्यकाल निर्धारण करने का एक मात्र सूत्र यह है कि संक्रांति के पुण्यकाल घटियों का जिस दिन, जिस भाग में एक भी घटी पड़े उसी दिन उस भाग में पुण्यकाल होगा। एवं इसी आधार पर रात्रि में संक्रांति होने पर त्रिधा विचार इस प्रकार से किया जाता है जो मकर और कर्क को छोड़कर किया जाता है । यहां रात्रि का तात्पर्य संध्या से भिन्न काल है अर्थात सायं संध्या और प्रातः संध्या के मध्य का काल। सायं संध्या पूर्व दिन के रूप में स्वीकार किया गया है और प्रातः संध्या पर दिन के रूप में चाहे कोई भी संक्रांति हो। त्रिधा विचार :

रात्रि में संक्रांति
रात्रि में संक्रांति
  1. यदि सायं संध्या के पश्चात् और निशीथ काल से पूर्व (४ – १४ घटी) तक संक्रांति हो तो पूर्व दिन परार्द्ध में पुण्यकाल होगा।
  2. यदि निशीथ काल (१५ – १६ घटी) में संक्रांति हो तो दोनों ही दिन अर्थात पूर्व दिन परार्द्ध एवं पर दिन उत्तरार्द्ध में पुण्यकाल होगा।
  3. यदि निशीथ काल से प्रातः संध्या के बीच (१७ – २७ घटी) के मध्य संक्रांति हो तो अगले दिन पूर्वार्द्ध में पुण्यकाल होगा।

ध्यातव्य : यहां घटी का तात्पर्य २४ मिनट नहीं होगा अपितु रात्रिमान का ३०वां भाग होगा।

कर्क और मकर का विशेष नियम : कर्क संक्रांति यदि प्रातः संध्या से पूर्व हो तो पूर्व दिन परार्द्ध में पुण्यकाल किन्तु प्रातः संध्या में हो तो अगले दिन सम्पूर्ण पुण्यकाल। इसी प्रकार मकर संक्रांति यदि सायं संध्या के पश्चात् हो तो अगले दिन पूर्वार्द्ध में पुण्यकाल और यदि सायं संध्या में ही हो तो पूर्व दिन (उसी दिन) सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल होगा।

मकर और कर्क संक्रांति के नियम

निवेदन : उपरोक्त विश्लेषण में किसी भी दुराग्रह से रहित भाव का अवलंबन लेते हुये त्रुटिरहित और सभी प्रमाणों की संगति करते हुये निर्णय को ढूंढने का प्रयास किया गया है। किन्तु यह संभव है कि कदाचित कहीं विसंगति प्रकट हो तो हमें अवगत करके अनुगृहीत अवश्य करें : 7992328206

मकर संक्रांति2026202720282029
दिनांक14 जनवरी14 जनवरी14 जनवरी 14 जनवरी
दिनबुधवारगुरुवारशुक्रवाररविवार
संक्रमण कालअपराह्न 3:06 (pm) बजेरात 9:09 (pm) बजेरात 3:23 (am) बजेपूर्वाह्ण 9:26 (am) बजे
पुण्यकालसम्पूर्ण दिन १४ जनवरीशुक्रवार, १५ जनवरी, पूर्वार्द्ध,शनिवार, १५ जनवरी, पूर्वार्द्धसम्पूर्ण दिन १४ जनवरी
उल्लेखनीय : ये तथ्य दृश्य गणना पर आधारित हैं एवं ऊपर किये गये विश्लेषण के अनुसार है।

निष्कर्ष

“संक्रांति सर्वस्व का यह गहन अनुशीलन सिद्ध करता है कि संक्रांति निर्णय केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक उन्नत खगोलीय विज्ञान है। रात्रि संक्रमण के त्रिधा विचार से लेकर मकर और कर्क संक्रांति के विशिष्ट अपवादों तक, प्रत्येक नियम का उद्देश्य भक्त को उस ‘सूक्ष्म काल’ से जोड़ना है जहाँ दान और स्नान का फल अनंत गुना हो जाता है। यह आलेख पंचांगकारों के लिए एक मार्गदर्शिका और जिज्ञासुओं के लिए ज्ञान का अक्षय कोष है, जो यह स्पष्ट करता है कि जब मुख्य काल दुर्जेय हो, तो शास्त्रीय प्रतिनिधि व्यवस्था के माध्यम से कैसे धर्म की रक्षा की जाती है।”

संक्रांति निर्णय का सूक्ष्म विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि पुण्यकाल का निर्धारण संक्रांति के समय और राशि की प्रकृति पर निर्भर करता है। जहाँ दिन की संक्रांति संपूर्ण दिन को पवित्र करती है, वहीं रात्रि की संक्रांति निशीथ काल के गणित पर आधारित होती है। कर्क और मकर संक्रांति के विशेष नियम हमें प्रकृति और सौर-गति के साथ तालमेल बिठाने का मार्ग दिखाते हैं। अंततः, शास्त्रीय वचनों का सार यही है कि संक्रांति के निकटतम उपलब्ध समय में किया गया सत्कर्म अक्षय फल प्रदान करता है।

FAQ

प्रश्न १: ‘संक्रांति सर्वस्व’ के अनुसार पुण्यकाल की सटीक अवधि क्या है?

सूर्य संक्रमण एवं पुण्यकाल

उत्तर : शास्त्रानुसार संक्रांति के समय से १६ घटी पूर्व और १६ घटी बाद का समय (कुल ३२ घटी) मुख्य पुण्यकाल है। विशेष परिस्थितियों में ३३ या ४० घटी का भी प्रावधान है, जो संक्रांति के प्रकार पर निर्भर करता है।

प्रश्न २: यदि संक्रांति आधी रात (निशीथ काल) में हो, तो दान कब करना चाहिए?

उत्तर : यदि संक्रांति ठीक निशीथ काल में हो, तो पूर्व दिन का उत्तरार्द्ध और अगले दिन का पूर्वार्द्ध, दोनों ही समय दान-पुण्य के लिए प्रशस्त हैं।

प्रश्न ३: मकर और कर्क संक्रांति के नियम अन्य संक्रांतियों से अलग क्यों हैं?

मकर और कर्क संक्रांति के नियम

उत्तर : ये दोनों ‘अयन’ संक्रांतियाँ हैं (उत्तरायण और दक्षिणायन)। शास्त्रानुसार, मकर संक्रांति रात्रि में होने पर उसका पुण्यकाल अगले दिन प्राप्त होता है, जबकि कर्क संक्रांति रात्रि में होने पर उसका पुण्यकाल पूर्व दिन ही ग्रहण किया जाता है।

प्रश्न ४: क्या दिन में होने वाली सभी संक्रांतियों का पुण्यकाल एक समान होता है?

दिन में संक्रांति हो तो सम्पूर्ण दिन पुण्यकाल होता है

उत्तर : हाँ, “अहः कृत्स्नं” के सिद्धांत के अनुसार, यदि संक्रांति दिन के किसी भी भाग में हो, तो वह संपूर्ण सूर्योदय से सूर्यास्त तक का दिन पुण्यकाल माना जाता है।

प्रश्न ५: इस आलेख में ‘घटी’ की गणना हेतु क्या विशेष निर्देश हैं?

उत्तर : रात्रि में संक्रांति होने पर पुण्यकाल निर्धारण हेतु घटी का मान २४ मिनट न मानकर, उस दिन के ‘रात्रिमान का ३०वां भाग’ माना जाना चाहिए, ताकि आध्यात्मिक फल की प्राप्ति सटीक समय पर हो सके।

प्रश्न ६: निशीथ काल क्या है और यह संक्रांति निर्णय में क्यों महत्वपूर्ण है?

निशीथ काल क्या है

उत्तर : रात्रि का ८वां मुहूर्त (मध्य रात्रि के आसपास का समय) निशीथ काल कहलाता है। यह पुण्यकाल को पूर्व दिन या अगले दिन स्थानांतरित करने का मुख्य विभाजक बिंदु है।

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