ग्रहों की अवस्था के अनुसार तो फलों के निर्धारण को हम जानते ही हैं किंतु उनके शुभाशुभ फलों का और अधिक गूढ़ ज्ञान प्राप्त करने के लिये ग्रहों का बल जानना आवश्यक होता है। जो ग्रह जितना बली होता है वह उतना ही अधिक फल देने वाला होता है, जीवन को प्रभावित करने वाला होता। जो ग्रह सर्वाधिक बली होता है हमारा जीवन उससे सर्वाधिक प्रभावित होता है। यहां हम ग्रहों के बलाबल का निर्धारण करना सीखेंगे जो कि ज्योतिष ग्रंथों में वर्णित हैं।
Shadbala – कुंडली में बली ग्रह की पहचान करने के लिये षड्बल कैसे निकालते हैं ?
ग्रहों के बलाबल का विचार करने की विधि को षड्बल विचार कहा गया है जिसका तात्पर्य है ६ प्रकार के बलों का विचार करना। सारावलीकार ने इसके विषय में लिखा है :
दिक्स्थानकालचेष्टाकृतं बलं सर्वनिर्णयविधाने। वक्ष्ये चतुः प्रकारं ग्रहस्तु रिक्तो भवेदबलः॥३४॥
सारावली – ग्रहयोनिभेदाध्याय ॥२॥३४॥
यहां दिग्बल, स्थानबल, कालबल और चेष्टाबल ये चार मुख्य बल बताये गये हैं इसमें दो और बल निसर्ग बल और दृष्टिबल मिलाने से षड्बल हो जाता है। ग्रहों के बल का विचार करने के लिये षड्बल का ही निर्धारण किया जाता है।
क्रमेण दृक्स्थाननिसर्गचेष्टादिक्कालवीर्याणि च षड्बलानि ।
सुधाकरेष्विन्दुशरेन्दुशैलभेदानि तानि प्रवदन्ति सन्तः ॥३८॥
जातकपारिजात (ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्शाशः) – २
ग्रहों के षड्बल के बारे में जातकपारिजात कहता है – दृग्बल/दृष्टिबल, स्थानबल, निसर्गबल, चेष्टाबल, दिग्बल / दिशाबल और कालबल
अब हम ग्रहों के षड्बल को गंभीरता से समझेंगे :
स्थान बल
स्वोच्चत्रिकोणस्वसुहृद्दृगाणराश्यंशवैशेषिकवर्गवन्तः ।
आरोहवीर्याधिकविन्दुकास्ते खेचारिणः स्थानबलाधिकाः स्युः ॥३३॥
नीचारिपापस्वगयोगनिरीक्ष्यमाणास्तद्वर्गसन्धिलघुबिन्दुदुरंशकाश्च ।
आदित्यरश्मिपरिभूतपराजितास्ते दृष्टयादिशक्त्यसहिताश्च न शोभनाः स्युः ॥३४॥
जातकपारिजात (ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्शाशः) – २
मित्रस्वांशकसंस्थितः शुभफलैर्दृष्टो बलीयान्ग्रहः
स्त्रीक्षेत्रे शशिभार्गवौ नरगृहे शेषा बले स्थानजे॥३५/२॥
सारावली – ग्रहगुणाध्याय ॥४॥
पुंस्त्रीनपुंसकाख्याः क्षेत्रेष्वाद्यन्तमध्यसंप्राप्ताः।
सूर्यान्निर्गत्य सदा नवोदिता यवनराजमतम्॥३८॥
स्वोच्चसुहृत्स्वत्रिकोणनवांशैः स्थानबलं स्वगृहोपगतैश्च ।
बृहज्जातकम् ॥२॥१९/१॥
बृहज्जातक के अनुसार उच्च, मूल त्रिकोण, मित्रगृह, उच्चादि नवांश एवं स्वगृह में स्थित ग्रह को स्थानबल प्राप्त होता है। अन्यान्य ज्योतिषीय ग्रंथों में कुछ और विशेष स्थितियां भी वर्णित हैं जिसके अनुसार निम्न अवस्थाओं में ग्रह स्थान बल प्राप्त करते हैं अर्थात स्थानबली कहलाते हैं :
- यदि ग्रह उच्च राशि में स्थित हो।
- यदि ग्रह मूल त्रिकोण में स्थित हो।
- यदि ग्रह स्वगृही अथवा मित्र/अधिमित्र गृही हों।
- यदि ग्रह अपने उच्चादि नवांश में स्थित हो।
- यदि ग्रह शुभयोगकारक ग्रहों से दृष्ट हो।
- चन्द्र और शुक्र समराशि में शेष ग्रह विषम राशि में स्थित हो।
- पुरुष ग्रह (सूर्य, मंगल और गुरु) प्रथम द्रेष्काण में, नपुंषक ग्रह (बुध, शनि) द्वितीय द्रेष्काण में, स्त्री ग्रह (चन्द्र, शुक्र) अंतिम द्रेष्काण में द्रेष्काण बल प्राप्त करते हैं एवं यह भी स्थानबल में ही गण्य होता है।
- केन्द्र में स्थित ग्रह भी पूर्ण स्थानबल प्राप्त करता है।
दिग्बल / दिशाबल
विलग्नपातालबधूनभोगा बुधामरेज्यौ भृगुसूनुचन्द्रौ ।
मन्दो धरासूनुदिवाकरौ चेत् क्रमेण ते दिग्बलशालिनः स्युः ॥३५॥
जातकपारिजात (ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्शाशः) – २
लग्ने जीवबुधौ दिवाकरकुजौ व्योम्नि स्मरे भास्करि-
र्बन्धाविन्दुसितौ दिशाकृतमिदं स्वोच्चे स्वकोण स्वभे॥३५/१॥
सारावली – ग्रहगुणाध्याय ॥४॥
दिक्षु बुधाङ्गिरसौ रविभौमौ सूर्यसुतः सितशीतकरौ च ॥
बृहज्जातकम् ॥२॥१९/२॥
बृहज्जातक के अनुसार पूर्व दिशा अर्थात लग्न में बुध और गुरु, दक्षिण दिशा अर्थात दशम भाव में सूर्य और मंगल, पश्चिम अर्थात सप्तम भाव में शनि, उत्तर दिशा अर्थात चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा और शुक्र दिग्बली होते हैं अर्थात दिग्बल प्राप्त करते हैं। अन्य ज्योतिष ग्रंथों में भी दिग्बल अर्थात दिशाबल के संबंध में भी यही मत प्राप्त होता है।
कालबल
निशीन्दुमन्दावनिजाः परेऽहनि स्वकीयहोरासममासवासराः ।
सितादिपक्षद्वयगाः शुभाशुभा बुधः सदा कालजवीर्यशालिनः ॥३६/१॥
जातकपारिजात (ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्शाशः) – २
जीवार्कास्फुजितोऽह्नि विच्च सततं मन्देन्दुभौमा निशि
होरामासदिनाब्दपाश्च बलिनः सौम्याः सितेऽन्येऽसिते॥३६/१॥
सारावली – ग्रहगुणाध्याय ॥४॥
प्राग्रात्रिभागेऽतिबलः शशाङ्कः शुक्रो निशार्धेऽवनिजो निशान्ते।
प्रातर्बुधो मध्यदिने च सूर्यः सर्वत्र जीवोऽर्कसुतो दिनान्ते॥३९॥
निशि शशिकुजसौराः सर्वदा ज्ञोऽह्नि चान्ये
बहुलसितगतः स्युः क्रूर सौम्याः क्रमेण ।
द्व्ययनदिवसहोरामासपैः कालवीर्यं ॥
बृहज्जातकम् ॥२॥२१/१॥
बृहज्जातक के अनुसार काल बल को निम्न बिंदुओं में स्पष्ट किया जा सकता है :
- चन्द्र, मंगल और शनि रात्रि काल में बलि होते हैं अर्थात यदि रात्रि में जन्म हुआ हो तो उस जातक की कुंडली में ये तीनों ग्रह कालबली कहलायेंगे।
- सूर्य, गुरु और शुक्र दिन में बलि होते हैं अर्थात यदि दिन में जन्म हुआ हो तो उस जातक की कुंडली में ये तीनों ग्रह कालबली कहलायेंगे।
- बुध दिन और रात दोनों में ही कालबल प्राप्त करता है।
- शुभग्रह शुक्ल पक्ष में और पापग्रह कृष्ण पक्ष में कालबली होते हैं।
- जो ग्रह वर्ष का अधिपति हो वह भी कालबल प्राप्त करता है।
- जो ग्रह वर्ष का मासाधिपति हो वह भी कालबल प्राप्त करता है।
- जो ग्रह वर्ष का वाराधिपति हो वह भी कालबल प्राप्त करता है।
- इसी प्रकार अपनी होरा में भी ग्रह कालबल प्राप्त करता है।
दिन और रात्रि के त्रिभाग के आधार पर कालबल के संबंध में सारावली से कुछ और विशेषता प्राप्त होती है जो इस प्रकार हैं :
- चन्द्र रात्रि के प्रथम त्रिभाग में बली होता है।
- शुक्र रात्रि के द्वितीय (मध्य) त्रिभाग में बली होता है।
- मंगल रात्रि के तृतीय (अंतिम) त्रिभाग में बली होता है।
- बुध दिन के प्रथम त्रिभाग में बली होता है।
- सूर्य दिन के द्वितीय (मध्य) त्रिभाग में बली होता है।
- शनि दिन के तृतीय (अंतिम) त्रिभाग में बली होता है।
- गुरु संपूर्ण दिन बली होता है।
चेष्टाबल
जैत्रा व्क्रसमागमोपगसितज्ञारामरेज्यासिताः,
दिव्याशायनगेन्दुतिग्मकिरणौ चेष्टाबलांशाधिकाः ॥ ३६/२॥
जातकपारिजात (ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्शाशः) – २
संग्रामे जयिनो विलोमगतयः संपूर्णगावो ग्रहाः
सूर्येन्दू पुनरुत्तरेण बलिनौ सत्योक्तचेष्टाबले॥३६॥
सारावली – ग्रहगुणाध्याय ॥४॥
उत्तरमयनं प्राप्ताः शुक्रकुजार्केन्द्रमन्त्रिणो बलिनः।
याम्यं शशिरविपुत्रौ द्वयेऽपि शशिजः स्ववर्गस्थः॥३७॥
उदगयने रविशीतमयूखौ वक्रसमागमगाः परिशेषाः ।
विपुलकरा युधि चेत्तिरसंस्थाश्चेष्टितवीर्ययुताः परिकल्प्याः ॥
बृहज्जातकम् ॥२॥२०॥
चेष्टाबल को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है :
- सूर्य और चन्द्रमा उत्तरायण में बली होते हैं।
- शेष मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि वक्री होने पर बली होते है, साथ ही चन्द्रमा से समागम होने पर भी बली होते हैं।
- ग्रहयुद्ध में विजयी ग्रह बली होता है।
- प्रफुल्लित किरणों वाला ग्रह भी बली होता है।
निसर्गबल
सौम्यक्षेपयुता महीसुतभुस्वाश्चेष्टाबलाढ्याः क्रमान्।
नैसर्गस्य बलाधिकाः शनिकुजज्ञाचार्यशुक्रेन्द्वनाः ॥३७॥
जातकपारिजात (ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्शाशः) – २
मन्दारबुधगुरुसिताः शशिसूर्यावुत्तरोत्तरं बलिनः।
स्वाभाविकबलमेतद्बलसाम्ये चिन्तयेत्प्राज्ञः॥४०॥
सारावली – ग्रहगुणाध्याय ॥४॥
शरुबुगुशुचसाद्या वृद्धितो वीर्यवन्त: ॥२१/२॥
बृहज्जातकम् ॥२॥
शरुबुगुशुचसाद्या वृद्धितो वीर्यवन्त: – यहां ग्रहों के निसर्गबल क्रमशः स्पष्ट होता है। शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्रमा और सूर्य क्रमशः अधिक बली होते हैं जो निसर्ग बल के नाम से जाना जाता है।
यह निसर्ग बल तब बली ग्रह के निर्धारण में अधिक उपयोगी होता है जब दो ग्रहों के बल समान हों। दो ग्रह यदि समान बली हो तो जो निसर्ग में बली होता है वह बली सिद्ध होता है।
दृग्बल/दृष्टिबल
शुभग्रह, कारक ग्रह, मित्र ग्रह, लग्नेश, शुभयोग कारक ग्रहों से जो दृष्ट हो वह दृग्बली होता है। दृग्बल में गुरु की दृष्टि का विशेष महत्व होता है। ग्रह दृष्टि से संबंधित चर्चा पृथक करेंगे जहां इस विषय को और गंभीरता से समझा जा सकेगा।
फलादेश में षड्बल की उपयोगिता
- सटीक फलादेश: षड्बल की गणना करने से ज्योतिषी यह निश्चित कर सकता है कि किसी ग्रह के फल कितने निश्चित एवं प्रभावशाली होंगे।
- दशा/अंतर्दशा विश्लेषण: दशा में जिस ग्रह का षड्बल अधिक है, वह अधिक सक्रियता से फल देता है।
- निदान और उपाय: कमजोर षड्बल वाले ग्रह के लिए पूजा, अनुष्ठान, दान आदि उपाय सुझाए जाते हैं।
- योगों की पुष्टि: षड्बल के आधार पर भी योगों के फल की मात्रा का निर्धारण किया जा सकता है।
निष्कर्ष
षड्बल के बिना कुंडली का विश्लेषण अधूरा माना जाता है। केवल ऋषि सूत्रों पर नहीं, गणितीय विधि एवं ग्रंथों के शुद्ध सिद्धांतों के आधार से षड्बल का सही निर्णय ही फलादेश की प्रमाणिकता को सूक्ष्म बनाता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की सटीकता बढ़ जाती है। यदि आप भी सटीक फलादेश करना चाहते हैं तो इसके लिये यह बहुत ही आवश्यक होता है कि ग्रहों के षड्बल का भी विचार करें।
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