ज्योतिष में ग्रहों की दृष्टि का विचार कैसे करते हैं – grah drishti

ज्योतिष में ग्रहों की दृष्टि का विचार कैसे करते हैं - grah drishti ज्योतिष में ग्रहों की दृष्टि का विचार कैसे करते हैं - grah drishti

जब हम जन्मपत्रिका विश्लेषण करते हुये फलादेश करना चाहते हैं तो हमें ग्रहों की दृष्टि (grah drishti) का भी विचार करना होता है। ग्रहों के परस्पर युति, भाव परिवर्तन, दृष्टि संबंध आदि बनते हैं और इन संबंधों द्वारा एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। जो ग्रह जिस भाव अथवा जिस ग्रह को देख रहा हो वह उससे प्रभावित होता है और इसके लिये ग्रह दृष्टि विचार का ज्ञान होना आवश्यक होता है। यहां हम ग्रहों की दृष्टि का विचार कैसे करते हैं इसे समझने का प्रयास करेंगे।

पंचधा मैत्री को समझने के लिये हमें सर्वप्रथम इसके निर्धारण के दो प्रकारों को समझना होगा। ग्रहों की मैत्री दो प्रकार की होती है एक नैसर्गिक मैत्री और दूसरी तात्कालिक मैत्री और इन दोनों को समझने के पश्चात् ही पंचधा मैत्री विचार किया जा सकता है, पंचधा मैत्री चक्र का निर्माण किया जा सकता है।

ग्रह दृष्टि विचार – बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के पच्चीसवें अध्याय (ग्रहस्फुटदृष्टिकथनाध्ययाः) में ग्रहों की दृष्टि के संबंध में विवरण प्राप्त होता है। यद्यपि यहां और भी सूक्ष्म विचार मिलता है किन्तु हम ग्रहों की दृष्टि को ही समझेंगे और सामान्य रूप से जो समझा जाता है उससे कहीं आगे प्रमाण है।

सामान्य रूप से हमें ग्रहों की दृष्टि सातवें स्थान पर होती है, मंगल की चतुर्थ कर अष्टम, गुरु की पंचम और नवम, शनि की तृतीय और दशम में विशेष दृष्टि होती है, किन्तु वास्तविकता इससे बहुत आगे है।

त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे च सप्तमे।
पादवृद्धया प्रपश्यन्ति प्रयच्छन्ति फलं तथा॥३॥

बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के पच्चीसवें अध्याय (ग्रहस्फुटदृष्टिकथनाध्ययाः) के तृतीय श्लोक में ग्रहों की दृष्टि के संबंध में जो कहा गया है वह यहां संलग्न चित्र में स्पष्टतः समझा जा सकता है। वास्तविकता यह है कि सभी ग्रह प्रथम, द्वितीय, षष्ठ, एकादश और द्वादश के अतिरिक्त अन्य सभी भावों व भावस्थित ग्रहों पर दृष्टि रखते हैं। वो अन्य सभी भाव हैं तृतीय और दशम, पंचम और नवम, चतुर्थ और अष्टम, सप्तम।

श्लोक में जो कहा गया है उसके अनुसार तृतीय और दशम में सभी ग्रहों की पाद (२५%) दृष्टि होती है, पंचम और नवम में अर्द्ध (५०%) दृष्टि, चतुर्थ और अष्टम में त्रिपाद (७५%) दृष्टि एवं सप्तम में पूर्ण (१००%) दृष्टि होती है जो संलग्न चित्र में दिखाया गया है।

ग्रहों की दृष्टि
ग्रहों की दृष्टि

उपरोक्त तथ्यों को यदि बिन्दुबार समझना चाहें तो इस प्रकार से समझ सकते हैं :

  • तृतीय और दशम में सभी ग्रहों की पाद (२५%) दृष्टि होती है।
  • पंचम और नवम में अर्द्ध (५०%) दृष्टि होती है।
  • चतुर्थ और अष्टम में त्रिपाद (७५%) दृष्टि होती है।
  • सप्तम में सभी ग्रहों की पूर्ण (१००%) दृष्टि होती है।

इस प्रकार हमने यह समझा की सप्तम भाव पर सभी ग्रहों की पूर्ण दृष्टि होती है किन्तु अन्यान्य भावों पर भी दृष्टि होती है किन्तु वह पूर्ण दृष्टि नहीं होती। इसमें कुछ अन्य विशेषता भी है जो अगले श्लोक से स्पष्ट होता है :

पूर्णं च सप्तमं सर्वे शानिजीवकुजाः पुनः।
विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोणचतुरष्टमान्‌॥४॥

इस श्लोक में बताया गया है कि पूर्ण दृष्टि सभी ग्रहों की सप्तम भाव व भावस्थित ग्रह पर होती है किन्तु शनि, गुरु और मंगल की पूर्ण दृष्टि में कुछ और विशेषता है जो इस प्रकार है :

  • शनि सप्तम भाव के अतिरिक्त तृतीय और दशम भाव पर भी पूर्ण दृष्टि रखता है।
  • गुरु सप्तम भाव के अतिरिक्त पंचम और नवम भाव पर भी पूर्ण दृष्टि रखता है।
  • मंगल सप्तम भाव के अतिरिक्त चतुर्थ और अष्टम भाव पर भी पूर्ण दृष्टि रखता है।

मंगल, गुरु और शनि पूर्ण दृष्टि से संबंधित इस विशेषता को अगले चित्रों में और अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है:

मंगल की पूर्ण दृष्टि
मंगल की पूर्ण दृष्टि
गुरु की पूर्ण दृष्टि
गुरु की पूर्ण दृष्टि
शनि की पूर्ण दृष्टि
शनि की पूर्ण दृष्टि

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