ज्योतिष शास्त्र में फलादेश करने के लिये ग्रहों का विशेष अध्यययन आवश्यक होता है और इसमें अनेकानेक विचार अनिवार्य होते हैं यथा : उच्च, नीच, मूलत्रिकोणी, स्वगृही, मित्रगृही, रिपुगृही आदि। अवस्था का निर्धारण एक भिन्न विषय है जिसमें मुख्यतः दीप्तादि व बालादि अवस्था का विचार किया जाता है। किन्तु ग्रहों का उच्चादि विचार स्वतंत्र रूप से किया जाता है जिसके अनुसार दीप्तादि अवस्था का भी निश्चय होता है। यहां हम ग्रहों के उच्चादि विचार करेंगे।
ग्रहों की उच्च और नीच राशि, त्रिकोण, स्वगृह एवं उनके फल विचार – uccha nich grah
बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के अध्यायः ३ ग्रहगुणस्वरूपाध्यायः में ग्रहों के उच्चादि फल अर्थात उच्च, मूलत्रिकोण, स्वगृही, मित्रगृही, समगृही, नीच ग्रह, रिपुगृही आदि के फलों का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है :
स्वोच्चे शुभं फलं पूर्णं त्रिकोणे पादवर्जितम्।
स्वर्क्षेऽर्धं मित्रगेहे तु पादमात्रं प्रकीर्तितम्॥५९॥
पादार्धं समभे प्रोक्तं शून्यं नीचास्तशत्रुभे।
तद्वद्दुष्टफलं ब्रूयाद् व्यत्ययेन विचक्षणः॥६०॥
हम उच्चादि ग्रहों के फलों को समझें इससे पूर्व यह आवश्यक है कि प्रथमतया ग्रहों के उच्च-नीच-त्रिकोण-स्वराशि-मित्रगृह-रिपुगृह आदि को समझ लें। इनका वर्णन भी हमें ज्योतिष शास्त्रों में मिलता है और बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के तृतीय अध्याय में जो है प्रथमतया उसका अवलोकन कर लें तदुपरांत अन्यान्य ग्रंथों के अनुसार भी समझेंगे :
मेषो वृषो मृगः कन्या कर्को मीनस्तथा तुला।
सूर्यादीनां क्रमादेते कथिता उच्चराश्यः॥४९॥
भागा दश त्रयोऽष्टाश्व्यस्तिथ्योऽक्षा भमिता नखाः।
उच्चात् सप्तमभं नीचं तैरेवांशैः प्रकीर्तितम्॥५०॥
रवेः सिंहे नखांशाश्च त्रिकोणमपरे स्वभम्।
उच्चमिन्दोर्वृषे त्र्यंशास्त्रिकोणमपरेंऽशकाः॥५१॥
मेषेऽर्कांशास्तु भौमस्य त्रिकोणमपरे स्वभम्।
उच्चं बुधस्य कन्यायामुक्तं पञ्चदशांशकाः॥५२॥
ततः पञ्चांशकाः प्रोक्तं त्रिकोणमपरे स्वभम्।
चापे दशांशा जीवस्य त्रिकोणमपरे स्वभम्॥५३॥
तुले शुक्रस्य तिथ्यंशास्त्रिकोणमपरे स्वभम्।
शनेः कुम्भे नखांशाश्च त्रिकोणमपरे स्वभम्॥५४॥
उपरोक्त तथ्य ही अन्यान्य ज्योतिषीय ग्रंथों में भी वर्णित हैं जिसका आगे और विश्लेषण किया गया है एवं इनके भाव भी वहां स्पष्ट होते हैं।
शास्त्रोक्त प्रमाणों से रहित चर्चा औचित्यपूर्ण नहीं होता है अस्तु प्रमाणों का अवलोकन/उल्लेख आवश्यक होता है। वर्त्तमान में २ – ३ दशकों से ऐसा देखा जा रहा है कि प्रमाणों को विवेचना करने वाले निगल जाते हैं और बड़ी-बड़ी पुस्तकें हिन्दी व अन्यान्य भाषाओं में भी लिखते रहते हैं एवं उसे पढ़कर ही लोग ज्योतिषी भी बन जाते हैं जो कथमपि उचित नहीं कहा जा सकता। जो ज्योतिषी बनना चाहते हैं उनके लिये ज्योतिष शास्त्रों का अध्ययन भी अनिवार्य होता है न कि ऐसी हिन्दी व अन्यान्य भाषाओं में लिखी पुस्तकों का अध्ययन मात्र। अस्तु अब आगे हम कुछ अन्य पुस्तकों के प्रमाणों का भी अवलोकन करेंगे।
फलदीपिकाकार ने प्रथम अध्याय (राशिभेदः) में ग्रहों की राशि, उच्च, नीच, मूलत्रिकोण एवं अंशो का भी वर्णन कर दिया है :
भौमः शुक्रबुधेन्दुसूर्यशशिजाः शुक्रारजीवार्कजाः
मन्दो देवगुरुः क्रमेण कथिता मेषादिराशीश्वराः।
सूर्यादुच्चगृहाः क्रियो वृषमृगस्त्रीकार्कमीनास्तुला
दिक्त्र्यंशैर्मनुयुक्तिथीषुभनखांशैस्तेऽस्तनीचाः क्रमात् ॥६॥
सिंहोक्षाजवधूहयाङ्गवणिजः कुंभस्त्रिकोणा रवेः
ज्ञेन्द्वोस्तूच्चलवान्नखोड्विनशरैर्दिग्भूतकृत्यंशकैः।
(चापाद्यर्धवधूनृयुस्घटतुला मर्त्याश्च कीटोऽलिभं
त्वाप्याः कर्कमृगापरार्धशफराः शेषाश्चतुष्पादकाः ॥७॥)
इसी प्रकार से सारावलीकार ने भी तृतीय अध्याय राशिभेदाध्यायः में मूलत्रिकोण, उच्च, नीच राशि व अंशों का ३ श्लोकों में वर्णन किया है जो इस प्रकार है :
कुजभृगुबुधेन्दुरविशशिसुतसितरुधिरार्यमन्दशनिजीवाः।
गृहपा नवभागानामजमृगतुलकर्कटाद्याश्च॥११॥
सिंहवृषमेषकन्याकार्मुकभृत्तौलिकुम्भधराः।
सूर्यादीनामेते त्रिकोणभवनानि कथ्यन्ते॥३४॥
सूर्यादीनामुच्चाः क्रियवृषमृगयुवतिकर्किमीनतुलाः।
स्वोच्चगृहकथितभागा यथाक्रमेणैव परमोच्चाः॥३५॥
दिग्वह्न्यष्टाविंशतितिथिबाणत्रिघनविंशतयः।
स्वोच्चात्सप्तमराशिर्नीचः स्यादंशकात्परमम्॥३६॥
सारावलीकार ने मूलत्रिकोण राशियों और स्वगृह का उल्लेख आगे पंचम अध्याय मिश्रकाध्यायः में किया है, जिसका अवलोकन आगे समझने के क्रम में करेंगे।
- मेषादि राशियों के स्वामी : क्रमशः मंगल, शुक्र, बुध, चंद्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि और गुरु
- सूर्यादि ग्रहों की उच्च राशियां : क्रमशः मेष, वृष, मकर, कन्या, कर्क, मीन और तुला
- सूर्यादि ग्रहों के उच्चांश : क्रमशः १०, ३, २८, १५, ५, २७ और २०
- सूर्यादि ग्रहों की नीच राशियां व अंश : उच्च से सातवीं राशि में उपरोक्त अंशानुसार
- सूर्यादि ग्रहों के मूल त्रिकोण : क्रमशः सिंह, वृष, मेष, कन्या, धनु, तुला और कुम्भ
- सूर्यादि ग्रहों के मूल त्रिकोणांश : क्रमशः २०, उच्चांश से आगे, १२, १५-२०, १०, ५ और २०
मित्रगृह और रिपुगृह उन ग्रहों की राशियां होती हैं जो मित्र-शत्रु होते हैं और इसका पृथक विश्लेषण होगा किन्तु आगे सारणी में उल्लिखित किया जायेगा।
बृहज्जातकम् के अनुसार
यदि हम ज्योतिष शास्त्रों में बृहज्जातकम् रचयिता वराहमिहिर की बात करें तो इनकी एक बड़ी विशेषता रही है और वो यह कि अल्प शब्दों में अधिक वर्णन करते हैं। इस कारण ऐसे विषयों का जो अन्यान्य ग्रंथों से सम्मत हो यदि बृहज्जातकम् में भी उपलब्ध हो तो उसे स्मृति में रखना अधिक सहज होता है।
प्रथम अध्याय के श्लोक ६ (आधे) में ग्रहों की राशियों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है :
क्षितिजसितज्ञचन्द्ररविसौम्यसितावनिजाः सुरगुरुमन्दसौरिगुरवश्च गृहांशकपाः ।(१-६)
मेषादि राशियों के स्वामी क्रमशः – क्षितिज (मंगल), सित (शुक्र), ज्ञ (बुध), चन्द्र, रवि, सौम्य (बुध), सित (शुक्र), अवनिजाः (मंगल), सुरगुरु (गुरु), मन्द (शनि), सौरि (शनि) और गुरवः (गुरु)
पुनः प्रथम अध्याय के ही १३वें श्लोक में ग्रहों के उच्च व उच्चांश का वर्णन किया गया है :
अजवृषभमृगाङ्गनाकुलीरा झषवणिजौ च दिवाकरादितुङ्गाः ।
दशशिखिमनुयुक्तिथीन्द्रियांशैस्त्रिनवकविंशतिभिश्च तेऽस्तनीचाः ॥१३॥
- सूर्यादि ग्रहों की उच्च राशियां – अज (मेष), वृषभ (वृष), मृग (मकर), अंगना (कन्या), कुलीरः (कर्क), झष (मीन) और वणिज (तुला);
- दिवाकरादितुङ्गा: – अर्थात सूर्य का मेष, चन्द्र का वृष, मंगल का मकर, बुध का कन्या, गुरु का कर्क, शुक्र का मीन और शनि की तुला, इस प्रकार से ग्रहों की उच्च राशियां हैं।
- उच्चांश – दश (१०), शिखी (३), मनुयुक् (२८), तिथि (१५), इन्द्रिय (५), त्रिनवक (२७) और विंशति (२०)
- निष्कर्ष (ग्रह-उच्चराशि-अंश) : सूर्य-मेष-१०, चन्द्र-वृष-३, मंगल-मकर-२८, बुध-कन्या-१५, गुरु-कर्क-५, शुक्र-मीन-२७ और शनि-तुला-२०
- तेऽस्तनीचाः – उपरोक्त राशियों के अस्त अर्थात सातवीं राशि में नीच होते हैं और अंश यथावत ही रहते हैं, अर्थात सूर्य-तुला-१०, चन्द्र-वृश्चिक-३, मंगल-कर्क-२८, बुध-मीन-१५, गुरु-मकर-५, शुक्र-कन्या-२७ और शनि-मेष-२०
इसी प्रकार से ग्रहों के मूलत्रिकोण का वर्णन श्लोक १४ के उत्तरार्द्ध में किया गया है :
सिंहो वृषः प्रथमषष्ठहयाङ्गतौलिकुम्भास्त्रिकोणभवनानि भवन्ति सूर्यात् ॥१४॥
- सूर्यादि ग्रहों के त्रिकोण इस क्रम से हैं : सिंहो (सिंह), वृषः (वृष), प्रथम (मेष), षष्ठ (कन्या), हयाङ्ग (धनु), तौलि (तुला) और कुम्भ
- ग्रहों के क्रम से लगाने पर : सूर्य – सिंह, चन्द्र – वृष, मंगल – मेष, बुध – कन्या, गुरु – धनु, शुक्र – तुला और शनि – कुम्भ
त्रिकोण राशियां मुख्य रूप से ग्रहों के स्वराशि ही होती हैं, चन्द्रमा की वृष है जिसमें ३ अंशों तक उच्च भी होता है। इस प्रकार एक संशय उत्पन्न हो सकता है कि ग्रहों के मूलत्रिकोण राशि में स्थित होने पर उसे स्वगृही माने या मूलत्रिकोणी ? इसका निवारण सारावली कार ने पंचम अध्याय (मिश्रकाध्याय) में श्लोक २१ से २४ पर्यन्त किया है जो इस प्रकार है :
विंशतिरंशाः सिंहे त्रिकोणमपरे स्वभवनमर्कस्य ।
उच्चं भागत्रितयं वृष इन्दोश्च त्रिकोणमपरेंऽशाः ॥२१॥
द्वादशभागा मेषे त्रिकोणमपरे स्वभं तु भौमस्य ।
उच्चबलं कन्यायां बुधस्य तिथ्यंशकैः सदा चिन्त्यम् ॥२२॥
परतस्त्रिकोणजातं पञ्चभिरंशैः स्वराशिजं परतः ।
दशभागा ईज्यस्य च त्रिकोणमपरे स्वभं चापे ॥२३॥
शुक्रस्य तु त्रिकोणं पञ्चभिरपरे स्वभं जूके ।
कुम्भे त्रिकोणनिजभे रविजस्य तथा रवेः सिंहे॥२४॥
- सिंह राशि में २० अंशों तक सूर्य का त्रिकोण होता है तत्पश्चात स्वगृह।
- वृष राशि में में ३ अंशों तक चन्द्रमा उच्च होता है तदुपरांत मूलत्रिकोण।
- मेष राशि में १२ अंशों तक मंगल मूलत्रिकोणी होता है तदुपरांत स्वगृही।
- कन्या राशि में १५ अंशों तक बुध उच्च होता है तदुपरांत २० अंशों तक मूलत्रिकोणी तदुपरांत स्वगृही।
- गुरु धनु में १० अंशों तक मूलत्रिकोणी होता है तदुपरांत स्वगृही।
- शुक्र तुला में ५ अंशों तक मूलत्रिकोणी होता है तदुपरांत स्वगृही।
- शनि कुम्भ में २० अंशों तक मूलत्रिकोणी होता है तदुपरांत स्वगृही।

ग्रहों के उच्च, उच्चांश, मूलत्रिकोण, स्वगृह, नीच, नीचांश आदि को जानने के पश्चात् मित्रगृह और रिपुगृह को भी जानना आवश्यक है यहां हम संक्षेपतः उद्धृत करेंगे क्योंकि पंचधा मैत्री विचार स्वतंत्र रूप से करेंगे जिसमें मित्र ग्रहों, रिपुग्रहों की जानकारी दी जाएगी। मित्रग्रह की राशियों को मित्रगृह, समग्रह की राशियों को समगृह और शत्रु गृह की राशियों को रिपुगृह कहा जाता है एवं उनमें स्थित ग्रहों को मित्रगृही, समगृही व रिपुगृही कहा जाता है।
| ग्रह | मित्रगृह | समगृह | रिपुगृह | स्वगृह |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मेष, कर्क, वृश्चिक, धनु और मीन | मिथुन और कन्या | वृष, तुला, मकर और कुम्भ | सिंह |
| चन्द्र | मिथुन, सिंह और कन्या | मेष, वृष, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन | xxxx | कर्क |
| मंगल | कर्क, सिंह, धनु और मीन | वृष, तुला, मकर और कुम्भ | मिथुन और कन्या | मेष, वृश्चिक |
| बुध | वृष, सिंह और तुला | मेष, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन | कर्क | मिथुन, कन्या |
| गुरु | मेष, कर्क, सिंह और वृश्चिक | कुम्भ और मीन | वृष, मिथुन, कन्या और तुला | धनु, मीन |
| शुक्र | मिथुन, कन्या, मकर और कुम्भ | मेष, वृश्चिक, धनु और मीन | कर्क और सिंह | वृष, तुला |
| शनि | वृष, मिथुन, कन्या और तुला | धनु और मीन | मेष, कर्क, सिंह और वृश्चिक | मकर, कुम्भ |
इसी प्रकार से ग्रहों के उच्च-नीच राशि-अंशादि को भी सारणीबद्ध करके समझा जा सकता है :
| ग्रह | उच्च/अंश | नीच/अंश | त्रिकोण/अंश | स्वगृह/अंश |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मेष / १० | तुला / १० | सिंह / २० | सिंह |
| चन्द्र | वृष / ३ | वृश्चिक / ३ | वृष / ३ – ३० | कर्क |
| मंगल | मकर / २८ | कर्क / २८ | मेष / १२ | मेष (१२-३०), वृश्चिक |
| बुध | कन्या / १५ | मीन / १५ | कन्या / १५ – २० | मिथुन, कन्या (२०-३०) |
| गुरु | कर्क / ५ | मकर / ५ | धनु / १० | धनु (१०-३०), मीन |
| शुक्र | मीन / २७ | कन्या / २७ | तुला / ५ | वृष, तुला (५-३०) |
| शनि | तुला / २० | मेष / २० | कुम्भ / २० | मकर, कुम्भ (२०-३०) |
फलों का विचार
अब इनके फलों का विचार समझना आवश्यक है और चर्चा का आरम्भ यहीं से किया गया था। बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के अध्यायः ३ ग्रहगुणस्वरूपाध्यायः में ग्रहों के उच्चादि फल अर्थात उच्च, मूलत्रिकोण, स्वगृही, मित्रगृही, समगृही, नीच ग्रह, रिपुगृही आदि के फलों का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है :
स्वोच्चे शुभं फलं पूर्णं त्रिकोणे पादवर्जितम्।
स्वर्क्षेऽर्धं मित्रगेहे तु पादमात्रं प्रकीर्तितम्॥५९॥
पादार्धं समभे प्रोक्तं शून्यं नीचास्तशत्रुभे।
तद्वद्दुष्टफलं ब्रूयाद् व्यत्ययेन विचक्षणः॥६०॥
उच्च ग्रह पूर्ण फलदायकत्व रखते हैं, त्रिकोणस्थ ग्रह पादवर्जित अर्थात चतुर्थांश न्यून या ७५%, स्वगृही ग्रह अर्द्ध फलदायकत्व रखते हैं और मित्रगृही पादमात्र अर्थात चतुर्थांश या २५%, समगृही ग्रह पादार्ध अर्थात अष्टमांश या १२.५% और नीच, अस्त, रिपुगृही ग्रह शून्य फलदायकत्व रखते हैं।
इसी प्रकार दुष्टफल का भी विचार करे किन्तु विपरीत रूप से अर्थात उच्चग्रह पूर्ण शुभफलदायकत्व रखता है तो अशुभफल शून्य होता है, एवं नीच, अस्त, रिपुगृही ग्रह शून्य शुभफल दायकत्व रखता है तो अशुभ फल का पूर्ण प्रदायकत्व रखता है। “तद्वद्दुष्टफलं ब्रूयाद् व्यत्ययेन विचक्षणः” का यही तात्पर्य है कि उपरोक्त प्रकार तो शुभफल के बारे में विचार करने के लिये बताया गया है, दुष्टफल अर्थात अशुभ फल के लिये इसके विपरीत क्रम से विचार करें।
यदि इस फलविचार को भी सारणी से समझें तो सरल हो जायेगा :
| ग्रह की स्थिति | शुभ फल | अशुभ फल |
|---|---|---|
| उच्चग्रह | 100% | 0% |
| त्रिकोणस्थ | 75% | 12.5% |
| स्वगृही | 50% | 25% |
| मित्रगृही | 25% | 50% |
| समगृही | 12.5% | 75% |
| नीच, अस्त, रिपुगृही | 0% | 100% |
इस आलेख में चर्चा का मुख्य विषय यही था कि ग्रहों के शुभाशुभ दोनों ही फल होते हैं किन्तु कौन सा ग्रह कितना शुभफल देगा और कितना अशुभ फल देगा इसका निर्धारण करना सरल नहीं होता किन्तु बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् इसका सूत्र भी बताया गया है और इसके अनुसार ही ज्योतिषियों को विचार करना चाहिये।
इसका विचार नहीं करने पर ही हम किसी ग्रह को अशुभफलदायक ही मान लेते हैं तो किसी को शुभफलदायक जबकि सभी ग्रहों के शुभाशुभ दोनों ही फल होते हैं और उनकी मात्रा में तारतम्यता स्थापित करने की आवश्यकता होती है। इसमें एक भ्रान्ति भी उत्पन्न हो सकती है कि उच्च और नीच ग्रहों के फल में तो १००% देखने को मिलता है किन्तु मध्य में नहीं। त्रिकोणी और समगृही ग्रहों के फलों में १२.५% फल का लोप देखा जा रहा है, उसी प्रकार स्वगृही और मित्रगृही के फलों में २५% फल का भी लोप देखा जा रहा है।
किन्तु भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रमाण पूर्ण रूपेण यही भाव स्पष्ट कर रहा है और प्रामाणिक चर्चा में संदेह का स्थान नहीं होता। यदि यह चर्चा प्रमाणरहित होती तो संदेह होना चाहिये था किन्तु यहां प्रमाण प्रस्तुत किया गया है अतः संदेह का कोई स्थान रिक्त नहीं रहना चाहिये।
विद्वद्जनों से आग्रह है कि आलेख में यदि किसी भी प्रकार की त्रुटि मिले तो हमें टिप्पणी/ईमेल करके अवश्य अवगत करने की कृपा करें।
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