जातक ज्योतिष में अवकहड़ा चक्र (avakhada chakra) का महत्वपूर्ण स्थान है। अवकहडा चक्र के माध्यम से जन्मपत्री निर्माण किये बिना तत्काल जातक के विषय में जाना जाता है और जातक के नामाक्षर, राशि, इष्ट, नाड़ी आदि कई महत्वपूर्ण तथ्यों का ज्ञान होता है। इस आलेख में हम अवकहडा चक्र क्या है अथवा अवकहड़ा चक्र क्या होता है और देखने की विधि क्या है यह समझेंगे।
अवकहड़ा चक्र क्या होता है व देखने की विधि : avakhada chakra
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प्रायः अवकहड़ा भी बोलते सुनते देखा जाता है किन्तु ये अवकहड़ा नहीं अवकहडा है। आर्य मातृका से वर्ण लिया गया है जिसका दो वर्ग होता है ४ – ४ वर्णों का और ५ – ५ वर्णों का। अवकहडा में ५ – ५ वर्णों का वर्ग लिया गया है जो इस प्रकार है अवकहड, मटपरत, नयभजख और गसदचल।
इस प्रकार मात्राओं का प्रयोग करते हुये १०० वर्ण हुये एवं दूसरे वर्ग से घ, ङ, छ, षणठ, धफढ तथा थ, झ, ञ लिया गया और कुल ११२ वर्ण हो गये।
उस काल में अभिजीत नक्षत्र को भी ग्रहण किया जाता था जिस कारण नक्षत्रों की संख्या २८ होती थी और इसके चरणों की संख्या ११२, किन्तु परवर्ती काल भचक्र अभिजीतरहित मानकर २७ समान भागों में बांटा गया और १०८ चरण व वर्ण हो गये। इस प्रकार अवकहडा नाम के पीछे इसके वर्णों का क्रम है जो अवकहड से आरम्भ होता है। अभिजीत के जो चार वर्ण हटाये गये वो हैं जू, जे, जो और खा।
अयनांश
किन्तु यहां एक और प्रश्न उत्पन्न हो जाता है वो यह कि नक्षत्र व राशि का आरम्भ अश्विनी से होता है किन्तु अवकहडा का आरम्भ तो कृत्तिका से होता है ऐसा क्यों ?
वर्त्तमान में कुछ लोगों के ऊपर अयनांश का ऐसा भूत सवार हो गया है कि वो निरयण पंचांगों की शाख पर ही प्रश्नचिह्न उत्पन्न करते हैं। सायन-सायन चिल्लाने वाले ऐसा गर्वान्वित होते हैं जैसे अयनांश की खोज उन्होंने ही किया हो और अब तीसमारखां बन रहे हैं। अवकहडा चक्र उनके इस भ्रम को तोड़ देता है। वास्तव में अश्विन्यादि नक्षत्र अथवा मेषादि राशि क्रम भिन्न है और सम्पात भिन्न है। वास्तव में जब अवकहडा चक्र बनाया जा रहा था तो उस समय सम्पात कृत्तिका में था जो वर्तमान में उत्तरभाद्र पद में है। “कृत्तिकादि भरण्यंतं” का भी यही तात्पर्य है।
अवकहडा चक्र

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ऊपर अवकहडा चक्र दिया गया है जिसमें नक्षत्रों, चरणों, राशियों के साथ योनि, गण, नाड़ी, युञ्जा, पाया, वर्ण, वश्य, हंसक और वर्ग को भी समाहित किया गया है। जन्म नक्षत्र और चरण ज्ञात होने के पश्चात् इसी अवकहडा चक्र से अन्य विशेष महत्वपूर्ण जानकारी ज्ञात की जाती है और पूर्व आलेख में जब हमने नक्षत्र चरण ज्ञात किया था उसके लिये अब यहां अवकहडा चक्र से अन्य विवरण को समझेंगे :
- प्रथम अभ्यास : 2/4/2025, पंचमी, बुध, इष्टकाल ४/१७, जन्म नक्षत्र कृत्तिका, भयात ५४/०३, भभोग ५४/३२, चरण – ४
- द्वितीय अभ्यास : 3/4/2025, षष्ठी, गुरु, इष्टकाल ४६/१३, जन्म नक्षत्र मृगशिरा, भयात ४५/३०, भभोग ५७/३७, चरण – ४
प्रथम उदाहरण में कृत्तिका नक्षत्र का चतुर्थ चरण है और द्वितीय उदाहरण में मृगशिरा नक्षत्र का चतुर्थ चरण है जिसके अनुसार सभी विवरण इस प्रकार ज्ञात होते हैं :
- कृत्तिका – नक्षत्र
- चरण – ४
- नामाद्याक्षर – ए
- राशि – वृष
- राशीश – शुक्र
- योनि – मेष
- योनिवैर – वानर
- गण – राक्षस
- नाड़ी – अन्त्य
- युञ्जा – पूर्वभाग
- पाया – लौह
- वर्ण – वैश्य
- वश्य – चतुष्पद
- हंसक – भूमि
- वर्ग – गरुड
- कृत्तिका – मृगशिरा
- चरण – ४
- नामाद्याक्षर – की
- राशि – मिथुन
- राशीश – बुध
- योनि – सर्प
- योनिवैर – नकुल
- गण – देव
- नाड़ी – मध्य
- युञ्जा – पूर्वभाग
- पाया – लौह
- वर्ण – शूद्र
- वश्य – मनुष्य
- हंसक – वायु
- वर्ग – मार्जार
इसी प्रकार से अन्य नक्षत्र और चरण के आधार भी विवरण ज्ञात किये जा सकते हैं। अवकहडा चक्र का विशेष विचार विवाह, साझेदारी, मैत्री, ग्रामवास आदि के लिये किया जाता है।
निष्कर्ष : अवकहडा चक्र का ज्योतिष में विशेष महत्व है और इसके आधार पर जातक से संबंधित अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती है जिसका जातक के जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव भी होता है। ये भिन्न विषय है कि वर्त्तमानकाल में इसका विशेष विचार सामान्य जनों के लिये नहीं किया जाता है। और यही कारण है कि अनेकों वैवाहिक संबंध, साझेदारी, ग्रामवास आदि दुष्कर हो जाते हैं।
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